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________________ अष्टत्रिंशत्तमं पर्व २५५ श्रावकानायिकासघं श्राविकाः संयतानपि । सन्मार्गे वर्तयनेष गणपोषणमाचरेत् ॥१६॥ श्रुताथिभ्यः श्रुतं दद्याद् दीक्षार्थिभ्यश्च वीक्षणम् । धर्माथिभ्योऽपि सद्धर्म स शश्वत् प्रतिपादयेत् ॥१७०॥ सवृत्तान् धारयन् सूरिरसद्वृत्तानिवारयन् । शोधयंश्च कृतादागोमलात् स 'बिभूयाद् गणम् ॥१७१॥ इति गणोपग्रहणम् । गणपोषणमित्याविष्कुर्वन्नाचार्यसत्तमः। ततोऽयं स्वगुरुस्थानसंक्रान्तो यत्नवान् भवेत् ॥१७२।। अधीतविद्यं तद्विद्यौः पादुतं मुनिसत्तमैः । योग्यं शिष्यमथाहूय तस्मै स्वं भारमर्पयेत् ॥१७शा गुरोरनुमतात् सोऽपि गुरुस्थानमधिष्ठितः । गुरुवृत्तौ स्वयं तिष्ठन् वर्तयेदखिले गणम् ॥१७४॥ इति स्वगुरुस्थानावाप्तिः। तत्रारोप्य भरं कृत्स्नं काले कस्मिश्चिदव्यथः । कर्यादेकविहारी स निःसडगत्वात्मभावनाम् ॥१७॥ निःसङगवृत्तिरकाको विहरन् स महातपाः। चिकीर्षुरात्मसंस्कारं नान्यं संस्कर्तुमर्हति ॥१७६॥ अपि रागं समुत्सृज्य शिष्यप्रवचनादिष । निर्ममत्वैकतानः संश्चर्याशद्धि तदाऽश्रयेत् ॥१७७॥ इति निःसङगत्वात्मभावना। कृत्वैवमात्मसंस्कारं ततः सल्लेखनोद्यतः । कृतात्मशुद्धिरध्यात्म योगनिर्वाणमाप्नुयात् ॥१७॥ करने में जो तत्पर रहता है उसके महर्षियोंने गणोपग्रहण नामकी क्रिया मानी है ॥१६८॥ इस आचार्यको चाहिये कि वह मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविकाओंको समीचीन मार्गमे लगाता हुआ अच्छी तरह संघका पोषण करे ।।१६९॥ उसे यह भी चाहिये कि वह शास्त्र अध्ययनकी इच्छा करनेवालोंको दीक्षा देवे और धर्मात्मा जीवोंके लिये धर्मका प्रतिपादन करे ॥१७०॥ वह आचार्य सदाचार धारण करनेवालोंको प्रेरित करे, दुराचारियोंको दूर हटावे और किये हुए स्वकीय अपराधरूपी मलको शोधता हुआ अपने आश्रितगणकी रक्षा करे ।।१७१॥ यह अट्ठाईसवीं गणोपग्रहण क्रिया है। ___ तदनन्तर इस प्रकार संघका पालन करता हुआ वह उत्तम आचार्य अपने गुरुका स्थान प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न सहित हो ॥१७२॥ जिसने समस्त विद्याएं पढ ली हैं और उन विद्याओंके जानकार उत्तम उत्तम मुनि जिसका आदर करते हैं ऐसे योग्य शिष्यको बुलाकर उसके लिये अपना भार सौंप दे ॥१७३॥ गुरुकी अनुमतिसे वह शिष्य भी गुरुके स्थानपर अधिष्ठित होता हुआ उनके समस्त आचरणोंका स्वयं पालन करे और समस्तसंघको पालन करावे ॥१७४।। यह उन्तीसवीं स्वगुरु-स्थानावाप्ति क्रिया है। इस प्रकार सुयोग्य शिष्यपर समस्त भार सौंपकर जो किसी कालमें दुःखी नहीं होता है ऐसा साधु अकेला विहार करता हुआ 'मेरा आत्मा सब प्रकारके परिग्रहसे रहित है' इस प्रकारकी भावना करे ॥१७५।। जिसकी वृत्ति समस्त परिग्रहसे रहित है, जो अकेला ही विहार करता है, महातपस्वी है और जो केवल अपने आत्माका ही संस्कार करना चाहता है उसे किसी अन्य पदार्थका संस्कार नहीं करना चाहिये अर्थात् अपने आत्माको छोड़कर किसी अन्य साधु या गृहस्थके सुधारकी चिन्तामें नहीं पड़ना चाहिये ।।१७६॥ शिष्य पुस्तक आदि सब पदार्थों में राग छोड़कर और निर्ममत्वभावनामें एकाग्र बुद्धि लगाकर उस समय उसे चारित्रकी शुद्धि धारण करनी चाहिये ॥१७७॥ यह तीसवीं निःसङगत्वात्मभावना क्रिया है । तदनन्तर इस प्रकार अपने आत्माका संस्कार कर जो सल्लेखना धारण करनेके लिये उद्यत हुआ है और जिसने सब प्रकारसे आत्माकी शुद्धि कर ली है ऐसा १ सारयन अ०, प०, इ०, स०, ल०, द०। २ पोषयेद् । ३ तिष्ठेद् वर्तयेत् सकलं गणम् ल० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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