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________________ महापुराणम् विस्तीर्णजनसम्भोग्यः कुजद्धं सालिमेखलैः। तरडगवसनः कान्तां पुलिनर्जघनरिव ॥१३॥ लोलोमिहस्तनिर्धूतपक्षिमालाकलस्वनः। किमप्यालपितुं यत्न तन्वन्ती वा तटदुमैः ॥१३२॥ क्षती न्यभदन्तानां "रोधोजवनवतिनीः । रुन्धतीमब्धिभीत्येव लसमिदुकलकः ॥१३३॥ रोमराजीमिवानीलां वनराजी विवृण्वतीम् । 'तिष्ठमानामिवावर्तव्यक्तनाभिमुदन्यते ॥१३४॥ विलोलवीचिसङवट्टाद् उत्थितां पतगावलिम् । पताकामिव बिभ्राणां लब्धां सर्वापगाजयात् ॥१३॥ समासमीनां पर्याप्तपयसं धीरनिःस्वनाम् । जगतां पावनीं मान्यां हसन्तीं गोमतल्लिकाम् ॥१३६॥ गुरुप्रवाहप्रसृतां तीर्थकामरुपासिताम् । गम्भीरशब्दसम्भूति जैनी श्रुतिमिवामलाम् ॥१३७॥ कीर्ति समुद्र तक गमन करनेवाली थी उसी प्रकार गङ्गा नदी भी समुद्र तक गमन करनेवाली थी, जिस प्रकार उनकी कीर्तिका प्रवाह पवित्र था उसी प्रकार गङ्गा नदीका प्रवाह भी पवित्र था और जिस प्रकार उनकी कीर्ति कल्पान्त काल तक टिकनेवाली थी उसी प्रकार गङ्गा नदी भी कल्पान्त काल तक टिकनेवाली थी। अथवा जो गङ्गा किसी स्त्रीके समान जान पड़ती थी, क्योंकि मछलियां ही उसके नेत्र थे, उठती हुई तरंगें ही भौहोंका नचाना था और दोनों किनारों के वनकी पंक्ति ही उसकी साड़ी थी। जो स्त्रियों के जवान भाग के समान सुन्दर किनारोंसे सहित थी, उसके वे किनारे बहुत ही बड़े थे। शब्द करती हुई हंसोंकी माला ही उनकी करधनी थी और लहरें ही उनके वस्त्र थे।-चञ्चल लहरों रूपी हाथोंके द्वारा उडाये हुए पक्षिसमूहों के मनोहर शब्दोंसे जो ऐसी जान पड़ती थी मानो किनारे के वृक्षोंके साथ कुछ वार्तालाप करने के लिये प्रयत्न ही कर रही हो ।-जो अपनी छलकती हुई लहरोंसे ऐसी जान पड़ती थी मानो तटरूपी नितम्ब प्रदेशपर जंगली हाथियोंके द्वारा किये हुए दातोंके घावोंको समुद्ररूप पतिके डरसे शोभायमान लहरोंरूपी वस्त्रसे ढक ही रही हो। जो दोनों ओर लगी हुई हरी भरी वनश्रेणियोंके प्रकट करने तथा साफ साफ दिखाई देनेवाली भंवरोंसे ऐसी जान पड़ती थीं मानों किसी स्त्रीकी तरह अपने समद्ररूप पतिके लिये रोमराजि और नाभि ही दिखला रही हो।-जो चंचल लहरोंके संघटनसे उड़ी हुई पक्षियोंकी पंक्तिको धारण कर रही थी और उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो सब नदियोंको जीत लेनेसे प्राप्त हुई विजय पताकाको ही धारण कर रही हो। जो किसी उत्तम गायकी हँसी करती हुई सी जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार उत्तम गाय समांसमीना अर्थात् प्रति वर्ष प्रसव करनेवाली होती है उसी प्रकार वह नदी भी समांस-मीना अर्थात् परिपुष्ट मछलियोंसे सहित थी, जिस प्रकार उत्तम गायमें पर्याप्त पय अर्थात् दूध होता है उसी प्रकार उस नदीमें भी पर्याप्त पय अर्थात् जल था, जिस प्रकार उत्तम गाय गम्भीर शब्द करती है उसी प्रकार वह भी गम्भीर कल-कल शब्द कर रही थी, उत्तम गाय जिस प्रकार जगतको पवित्र करनेवाली है उसी प्रकार वह भी जगतको पवित्र करनेवाली थी और उत्तम गाय जिस प्रकार पूज्य होती है उसी प्रकार वह भी पूज्य थी। अथवा जो जिनवाणीके समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार जिनवाणी गुरु-प्रवाह अर्थात् आचार्य परम्परासे प्रसृत हुई है उसी प्रकार वह भी गुरुप्रवाह अर्थात् बड़े भारी जलप्रवाहसे प्रसृत हुई थी-प्रवाहित हुई थी। जिस प्रकार जिन वाणी तीर्थ अर्थात् धर्मकी इच्छा करनेवाले पुरुषों १ कान्तः ल० । २ वालोमि-त० । ३-वनेभः ल० । ४ तीर । ५ प्रदर्शयन्तीम् । ६ मांसभक्षकमीनसहिताम् । प्रति वर्ष गर्भ गृहणन्तीम् । 'समांसमीना सा यैव प्रतिवर्ष प्रसूयते'। ७ प्रशस्तगाम् । गोमचचिकाम् ल०, द०, इ० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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