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________________ महापुराणम् रत्नं स्थपतिरप्यस्य वास्तु विद्यापदात्तधीः । नाम्ना भद्रमुखोऽनेकप्रासादघटने पटुः ॥१७७॥ शैलोदनो महानस्य या गहस्तीक्षरन्मदः । भद्रो गिरिचरः शुभ्रो नाम्ना विजयपर्वतः ॥१७॥ पवनस्य जयन् वेगं हयोऽस्य पवनञ्जयः। विजयार्द्धगुहोत्सङग हेलया यो व्यलङघयत् ॥१७॥ प्रागुक्तवर्णनं चास्य स्त्रीरत्नं रूढनामकम् । स्वभावमधुरं हृद्यं रसायनमिवापरम् ॥१८०॥ रत्नान्येतानि दिव्यानि बभूवुश्चक्रवर्तिनः । देवताकृतरक्षाणि यान्यलड्ययानि विद्विषाम् ॥१८॥ आनन्दिन्योऽब्धिनिर्घोषा भेर्योऽस्य द्वादशाभवन् । द्विषड्योजनमापूर्य स्वनिर्याः प्रदध्वनुः ॥१८२॥ आसन् विजयघोषाख्याः पटहा द्वादशापर। गृहकेकिभिरुग्रीवैः सानन्दं श्रुतनिःस्वनाः ॥१८३॥ गम्भीरावर्तनामानः शङखा गम्भीरनिःस्वनाः । चतुविशतिरस्यासन् शुभाः पुण्याब्धिसम्भवाः॥१८४॥ कटका रत्ननिर्माणा विभोर्वीराङगदाह्वयाः। रेजुः प्रकोष्ठमावेष्टय तडिबलयविभमाः ॥१८॥ पताकाकोटयोऽस्याष्टचत्वारिंशत्प्रमा मताः। मरुत्प्रेडखोलि तोत्प्रेडखदंशुकोन्मष्टखाङगणाः ॥१८६॥ महाकल्याणकं नाम दिव्याशनमभूद् विभोः। कल्याणाङगस्य येनास्य तृप्तिपुष्टीबलान्विते ॥१८७॥ भक्षाश्चामृतगर्भाख्या रुच्यास्वादाःसुगन्धयः । नान्ये जरयित शक्ता यान् ‘गरिष्ठरसोत्कटान् ॥१८॥ स्वायं चामृतकल्पाख्यं हृद्यास्वादं सुसंस्कृतम् । रसायनरसं दिव्यं पानकं चामृताह्वयम् ॥१८६॥ चिन्तामें नियुक्त था। ॥१७६॥ मकान बनानेकी विद्यामें जिसकी बुद्धि प्रवेश पाये हुई है और जो अनेक राजभवनोंके बनाने में चतुर है ऐसा भद्रमुख नामका उनका शिलावटरत्न (इंजीनियर) था ॥१७७। जो पर्वतके समान ऊंचा था, बहत बडा था, पूज्य था, जिससे मद झर रहा था, भद्र जातिका था और जिसका गर्जन-उत्तम था ऐसा विजयपर्वत नामका सफेद हाथी था ।।१७८॥ जिसने विजयार्धपर्वतकी गफाक मध्यभागको लीलामात्रमें उल्लंघन कर दिया था ऐसा वायुके वेगको जीतनेवाला पवनंजय नामका घोड़ा था ।।१७९॥ और जिसका वर्णन पहले कर चुके हैं, जिसका नाम अत्यन्त प्रसिद्ध है, जो स्वभावसे ही मधुर है और जो किसी अन्य रसायनक समान हृदयको आनन्द देनेवाला है ऐसा सुभद्रा नामका स्त्रीरत्न था ॥१८०। इस प्रकार चक्रवर्तीके ये दिव्य रत्न थे जिनकी देव लोग रक्षा किया करते थे, और जिन्हें शत्रु कभी उल्लंघन नहीं कर सकते थे ॥१८॥ उस चक्रवर्तीकि समद्रके समान गंभीर आवाजवाली आनन्दिनी नामकी बारह भेरियां थीं जो अपनी आवाजको बारह योजन दूर तक फैलाकर बजती थीं ॥१८२॥ इनके सिवाय बारह नगाड़े और थे जिनकी आवाज घरके मय र ऊंची गर्दन कर बड़े आनन्दके साथ सुना करते थे ।।१८३।। जिनकी आवाज अतिशय गंभीर है, जो शुभ हैं, और पुण्यरूपी समुद्रसे उत्पन्न हुए हैं ऐसे गम्भीरावर्त नामके चौबीस शंख थे ॥१८४॥ उस प्रभुके रत्नोंके बने हुए वीरांगद नामके कड़े थे जो कि हाथकी कलाईको घेरकर सुशोभित हो रहे थे और जिनकी कान्ति बिजलीक कड़ोंके समान थी ॥१८५।। वायुके मकोरेसे उड़ते हुए कपड़ोंसे जिन्होंने आकाशरूपी आंगनको झाड़कर साफ कर दिया है ऐसी उसकी अड़तालीस करोड़ पताकाएं थीं ॥१८६॥ महाराज भरतके महाकल्याण नाम का दिव्य भोजन था जिससे कि कल्याणमय शरीरको धारण करनेवाले उनके बलसहित तृप्ति और पुष्टि दोनों ही होती थीं ॥१८७।। जो अत्यन्त गरिष्ठ रससे उत्कट है, जिन्हें कोई अन्य पचा नहीं सकता तथा जो रुचिकर, स्वादिष्ट और सुगन्धित है ऐसे उसके अमृतगर्भ नामके भक्ष्य अर्थात् खाने योग्य मोदक आदि पदार्थ थे ॥१८८॥ जिनका स्वाद हृदयको अच्छा १ वास्तुविद्यास्थाने स्वीकृतबुद्धिः । २ पूज्य । ३ गिरिवरः ल०, प०। ४ चलनेनोच्चलत् । ५ आहारेण । ६ पुरुषाः । ७ जीर्णीकर्तुम् । ८ अतिगुरु । ६ क्रमुकदाडिमादि। ओदनाघशनं स्वाद्यं ताम्बूलादि जलादिकम् । पेयं स्वाद्यमप्पाचं त्याज्यान्येतानि शक्तिकैः ।" Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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