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218 What is the great Purana here? The offering was made with many jewels, gold and water. The foot-washing water was of jewels, the lamps were of jewels, the Akshata was of pearls. ||16|| The oblation was of nectar-like balls, the incense was of the wood of the divine tree. The flowers were a collection of Parijata and other divine flowers. ||164|| All the treasures were placed in the place of fruits. The Lord of Jewels made the offering of jewels. ||16|| The gods, knowing the rise of the Kevala Jnana, trembled with joy. Hundreds of gods, led by Indra, came to offer their respects. ||166|| The gentle wind, skilled in shaking the trees of the heavenly gardens and carrying away the banks of the Ganga, was fragrant. ||17|| The drums of the gods sounded deeply in the sky, and a collection of flowers born from the Kalpa trees fell from the sky. ||16|| A canopy of jewels, made by the divine artisans, adorned him above, and a divine throne made of precious gems shone below. ||166|| A group of fly whisks swayed on either side, and a suitable assembly ground, the Gandhakuti, was built, whose glory is renowned. ||200|| Thus, the Yogi-raja, worshipped by the gods and having attained the wealth of Kevala Jnana, was adorned with many munis, like the moon surrounded by stars. ||201|| Carrying the state of the Arhant Parameshti, born from the destruction of karmas, and therefore worshipped by the gods, Bhagavan Bahubali wandered throughout the earth. ||202|| Thus, Bahubali, knowing all things, satisfied the whole world with his words like nectar, and, purified by the presence of his revered father, Bhagavan Rishabhadeva, reached Mount Kailasa. ||203|| 1. Charu. 2. Pieces of sandalwood. 3. Indra. 4. On both sides. 5. Served. 6. Worshipped. 7. Of Rishabha.
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________________ २१८ महापुराणम् किमत्र बहना रत्नैः कृतोऽर्घः स्वर्णदोजलम् । पाद्यं रत्नाचिषो दीपास्तण्डुलेज्या च मौक्तिकः ॥१६॥ हविः पीयूषपिण्डेन धूपो देवदुमांशक: । पुष्पा, पारिजातादिसुरागसुमनश्चयः ॥१६४॥ सरत्ना निधयः सर्वे फलस्थाने नियोजिताः। पूजां रत्नमयोमित्यं रत्नेशो निरवर्तयत् ॥१६॥ सुराश्चासनकम्पेन ज्ञाततत्केवलोदयाः। चक्रुरस्य परामिज्यां शता ध्वरपुरःसराः ॥१६६॥ 'वर्मन्दं स्वरुद्यानतरुधूननचुञ्चवः। तदा सुगन्धयो वाताः स्वर्धनोशीकराहराः ॥१७॥ मन्द्रं पयोमुचा मार्गे दध्वनुश्च सुरानकाः। पुष्पोत्करो दिवोऽपतत् कल्पानोकहसंभवः ॥१६॥ रत्नातपत्रमस्योच्चैःनिमितं सुरशिल्पिभिः। पराय॑मणि निर्माणम् अभाद् दिव्यं च विष्टरम् ।। १६६ ॥ स्वयं व्ययतास्योच्चैः प्रान्तयोश्चामरोत्करः। सभावनिश्च तद्योग्या पप्रथे प्रथितोदया ॥२००) सुरैरियचितः प्राप्तकेवद्धिः स योगिराट् । व्यधुतन्मनिभिर्जुष्टः शशीवोडुभिराश्रितः ॥२०१॥ घातिकर्मक्षयोद्भूताम् उद्वहन् परमेष्ठिताम् । विजहार महीं कृत्स्नां सोऽभिगम्यः सुधाशिनाम् ॥२०२॥ इत्थं स विश्वविद्विश्वं प्रोणयन् स्ववचोऽमृतः । कैलासमचलं प्रापत् पूतं सन्निधिना गुरोः ॥२०३॥ मंत्रियोंके साथ, राजाओंके साथ और अन्तःपुरकी समस्त स्त्रियों तथा पुरोहितके साथ उन बाहुबली मुनिराजको बड़े हर्षसे नमस्कार किया था ॥१९२।। इस विषय में अधिक कहां तक कहा जावे, संक्षेपमें इतना ही कहा जा सकता है कि उसने रत्नोंका अर्थ बनाया था, गंगाके जलकी जलधारा दी थी, रत्नोंकी ज्योतिके दीपक चढ़ाये थे, मोतियोंसे अक्षतकी पूजा की थी, अमृतके पिण्डसे नैवेद्य अर्पित किया था, कल्पवृक्षके टुकड़ों (चूर्गों) से धूपकी पूजा की थी, पारिजात आदि देववृक्षों के फूलों के समूहसे पुष्पोंकी अर्चा की थी, और फलोंके स्थानपर रत्नोंसहित समस्त निधियां चढ़ा दी थीं इस प्रकार उसने रत्नमयी पूजा की थी ।।१९३-१९५।। आसन कम्पायमान होनेसे जिन्हें बाहुबलीके केवलज्ञान उत्पन्न होनेका बोध हुआ है ऐसे इन्द्र आदि देवोंने आकर उनकी उत्कृष्ट पूजा की ॥१९६।। उस समय स्वर्गके बगीचे के वृक्षोंको हिलानेमें चतुर तथा गंगा नदीकी बंदोंको हरण करनेवाला सुगन्धित वायु धीरे धीरे बह रहा था ॥१९७।। देवोंके नगाड़े आकाशमें गंभीरतासे बज रहे थे और कल्पवृक्षोंसे उत्पन्न हुआ फूलोंका समूह आकाशसे पड़ रहा था ॥१९८॥ उनके ऊपर देवरूपी कारीगरोंके द्वारा बनाया हुआ रत्नोंका छत्र सुशोभित हो रहा था और नीचे बहुमूल्य मणियोंका बना हुआ दिव्य सिंहासन देदीप्यमान हो रहा था ।।१९९।। उनके दोनों ओर ऊंचाई पर चमरोंका समूह स्वयं ढुल रहा था तथा जिसका ऐश्वर्य प्रसिद्ध है ऐसी उनके योग्य सभाभूमि अर्थात् गन्धकुटी भी बनाई गई थी ।।२००। इस प्रकार देवोंने जिनकी पूजा की है और जिन्हें केवलज्ञानरूपी ऋद्धि प्राप्त हुई है ऐसे वे योगिराज अनेक मुनियोंसे घिरे हुए इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे मानो नक्षत्रोंसे घिरा हुआ चन्द्रमा ही हो ॥२०१।। जो घातियाकर्मोंके क्षयसे उत्पन्न हुई अर्हन्त परमेष्ठी की अवस्थाको धारण कर रहे हैं तथा इसीलिये देव लोग जिनकी उपासना करते हैं ऐसे भगवान् बाहुबलीने समस्त पृथिवीमें विहार किया ॥२०२।। इस प्रकार समस्त पदार्थोंको जाननेवाले बाहुबली अपने वचनरूपी अमृतके द्वारा समस्त संसारको संतुष्ट करते हुए, पूज्य पिता भगवान् वृषभदेवके सामीप्यसे पवित्र हुए कैलास पर्वतपर जा पहुंचे ॥२०३।। १ चरुः । २ हरिचन्दनशकलैः। ३ इन्द्र । ४ उभयपाश्र्वयोः । ५ सेवितः । ६ आराध्यः । ७ वृषभस्य। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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