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________________ षट्त्रिंशत्तमं पर्व २१३ कषायतस्करस्य हतं रत्नत्रयं धनम्। सततं जागरूकस्य भूयो भूयोऽप्रमाद्यतः ॥१३॥ वाचंयमस्य तस्यासीन जातु विकथादरः। नाभिद्यतेन्द्रियैरस्य मनोदुर्ग सुसंवृतम् ॥१४०॥ मनोऽगार महत्यस्य बोधिता ज्ञानदीपिका। व्यदीपि तत एवासन् विश्वेऽर्था ध्येयतापदे ॥१४॥ मतिश्रुताभ्यां निःशेषम् अर्थतत्वं विचिन्वतः । करामलकवद् विश्वं तस्य विस्पष्टतामगात् ॥१४२॥ परीषहजर्वीप्तो विजितेन्द्रियशात्रवः । कषायशत्रनुच्छेद्य स तपो राज्यमन्वभूत् ॥१४३॥ योगजाश्चर्द्ध यस्तस्य प्रादुरासंस्तपोबलात् । यतोऽस्याविरभूच्छक्तिः त्रैलोक्यक्षोभणं प्रति ॥१४४॥ चतुर्भदेऽपि बोधेऽस्य समुत्कर्षस्तदोदभूत् । तत्तदावरणीयानां क्षयोपशमजम्भितः ॥१४॥ मतिज्ञानसमुत्कर्षात् कोष्ठबुद्ध्यादयोऽभवन् । श्रुतज्ञानेन 'विश्वाङगपूर्ववित्त्वादिविस्तरः ॥१४६॥ परमावधिमल्लङघयस सर्वावधिमासदत् । मनःपर्ययबोधे च सम्प्रापद् विपुलां मतिम् ।।१४७॥ ज्ञानशुद्ध्या तपःशुद्धिः अस्यासीदतिरेकिणी । ज्ञानं हि तपसो मूलं यद्वन्मूले महातरोः ॥१४॥ ॥१३८।। कषायरूपी चोरोंके द्वारा उनका रत्नत्रयरूपी धन नहीं चुराया गया था क्योंकि वे सदा जागते रहते थे और बार बार प्रमादरहित होते रहते थे। भावार्थ-लोकमें भी देखा जाता है कि जो मनुष्य सदा जागता रहता है और कभी प्रमाद नहीं करता उसकी चोरी नहीं होती। भगवान् बाहुबली अपने परिणामोंके शोधमें निरन्तर लवलीन रहते थे और प्रमादको पासम भी नहीं आने दतं थे इसलिय कषायरूपी चोर उनक रत्नत्रयरूपी धनको नहीं चु सके थे ॥१३९॥ वे सदा मौन रहते थे इसलिये कभी उनका विकथाओंम आदर नहीं होता था। और उनका मनरूपी दुर्ग अत्यन्त स रक्षित था इसलिये वह इन्द्रियोंके द्वारा नहीं तोड़ा जा सका था। भावार्थ-वे कभी विकथाएं नहीं करते थे और पांचों इन्द्रियों तथा मनको वशम रखते थे ।।१४०।। उनक मनरूपी विशाल घरमें सदा ज्ञानरूपी दीपक प्रकाशमान रहता था इसलिये ही समस्त पदार्थ उनके ध्येयकोटिम थे अर्थात् ध्यान करने योग्य थे। भावार्थपदार्थोका ध्यान करने के लिये उनका ज्ञान होना आवश्यक है, मुनिराज बाहुबलीको सब पदार्थों ज्ञान था इसलिय सभी पदार्थ उनके ध्यान करने योग्य थे ॥१४१॥ व मति और श्रुत ज्ञानके द्वारा संसारके समस्त पदार्थोका चिन्तवन करते रहते थे इसलिये उन्हें यह जगत् हाथपर रक्खे हुए आंवले के समान अत्यन्त स्पष्ट था ॥१४२॥ जो परिषहोंको जीत लेनेसे देदीप्यमान हो रहे हैं और जिन्होंने इन्द्रियरूपी शत्रुओंको जीत लिया है ऐसे वे बाहुबली कषायरूपी शत्रुओंको छेदकर तपरूपी राज्यका अनुभव कर रहे थे ॥१४३।। तपश्चरण का बल पाकर उन मुनिराजके योगके निमित्तसे होनेवाली ऐसी अनेक ऋद्धियां प्रकट हुई थीं जिनसे कि उनके तीनों लोकोंमें क्षोभ पैदा करनेकी शक्ति प्रकट हो गई थी ।।१४४॥ उस समय उनके मतिज्ञानावरण आदि काँक क्षमोपशमस मतिज्ञान आदि चारो प्रकारक ज्ञानोमवृद्धि हो गई थी ।।१४५।। मतिज्ञानकी वद्धि होनेसे उनके कोष्ठबद्धि आदि ऋद्धियां प्रकट हो गई थीं और श्रत ज्ञानके बढ़नेसे समस्त अंगों तथा पूर्वोक जानने आदिकी शक्तिका विस्तार हो गया था ।।१४६।। वे अवधिज्ञानमें परमावधिको उल्लंघन कर सर्वावधिको प्राप्त हुए थे तथा मनःपर्यय ज्ञानमें विपलमति मनःपर्यय ज्ञानको प्राप्त हए थे ॥१४७।। उन मुनिराजके ज्ञानकी शुद्धि होनेसे तपकी शुद्धि भी बहुत अधिक हो गई थी सो ठीक ही है क्योंकि जिस प्रकार किसी बड़े वृक्षके ठहरने में मूल कारण उसकी जड़ है उसी प्रकार तपके ठहरने आदिमें मूल कारण ज्ञान है ॥१४८।। १ मौनिवतिनः । २ ज्ञानदीपिकायाः सकाशात् । ३ चिन्तयतः । ४ उदेति स्म । ५ द्वादशागचतुर्दशपूर्ववेदित्वतनिरूपणादिविस्तरः। ६ बोधि प०, ल०। ७विपुलमतिमनःपर्ययज्ञानम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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