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________________ षट्त्रिंशत्तम पर्व २०६ दूषितां कटकैरेनां फलिनीमपि ते श्रियम् । करेणापि स्पृशेद धीमान् लतां कण्टकिनी च कः ॥८॥ विषकण्टकजालीव त्याज्यषा सर्वथाऽपि नः । निष्कण्टकां तपोलक्ष्मी स्वाधीनां कर्तुमिच्छताम् ॥९॥ मष्यतां च तदस्माभिः कृतमागों यदीदृशम् । प्रच्युतो विनयात् सोऽहं स्वं चापलमदीदृशम् ॥१००॥ इत्युच्चर गिरामोधो मुखाद् बाहुबलीशितुः। ध्वनिरब्दादिवाऽऽतप्तं जिष्णोराह्लादयन्मनः ॥१०॥ हा दुष्ट कृतमित्युच्चैः प्रात्मानं स विगर्हयन् । अन्ववातप्त पापेन कर्मणा स्वेन चक्रराट् ॥१०२॥ प्रयुक्तानुनयं भूयो मनुमन्त्यं स धीरयन् । न्यवृतन्न स्वसङ्कल्पाद् अहो स्थैर्य मनस्विनाम् ॥१०३॥ महाबलिनि निक्षिप्तरााद्धः स स्वनन्दने । दीक्षामुपादधे जैनी गुरोराराधयन् पदम् ॥१०४॥ दीक्षावल्ल्या परिष्वक्तः त्यक्ताशेषपरिच्छदः । स रेजे सलतः पत्रमोक्षक्षाम० इव द्रुमः ॥१०॥ गुरोरनुमतेऽधीतीर दधदेकविहारिताम् । प्रतिमायोगमावर्षम्१२ प्रातस्थे किल संवृतः ॥१०६॥ सशंसितव्रतोऽनाश्वान्१५ वनवल्लीततान्तिकः । वल्मीकरन्धनिःसर्पत सरासीद् भयानकः ॥१०७॥ १"श्वसदाविर्भवद्भोग भुजङ्गशिशुजम्भितः । विषाङकुरैरिवोपाङघिस रेजे वेष्टितोऽभितः ॥१०॥ कभी नहीं चाहते ॥९७।। यद्यपि यह तेरी लक्ष्मी फलवती है तथापि अनेक प्रकारके कांटोंसेविपत्तियोंसे दूषित है। भला, ऐसा कौन बुद्धिमान होगा जो कांटेवाली लताको हाथसे छ एगा भी ॥९८।। अब हम कंटक रहित तपरूपी लक्ष्मीको अपने आधीन करना चाहते हैं इसलिये यह राज्यलक्ष्मी हम लोगोंके लिये विषके कांटोंकी श्रेणीके समान सर्वथा त्याज्य है ॥९९॥ अतएव जो मैंने यह ऐसा अपराध किया है उसे क्षमा कर दीजिये। मैं विनयसे च्युत हो गया था अर्थात् मैंने आपकी विनय नहीं की सो इसे मैं अपनी चंचलता ही समझता हूँ ।।१००। जिस प्रकार मेघसे निकलती हुई गर्जना संतप्त मनुष्योंको आनन्दित कर देती है उसी प्रकार महाराज बाहुबली के मुखसे निकलते हुए वाणीके समूहने चक्रवर्ती भरतके संतप्त मनको कुछ-कुछ आनन्दित कर दिया था ।।१०१॥ 'हा मैंने बहुत ही दुष्टताका कार्य किया है' इस प्रकार जोर जोरसे अपनी निन्दा करता हुआ चक्रवर्ती अपने पाप कर्मसे बहुत ही संतप्त हआ ॥१०२।। जिसमें अनेक प्रकारके अननय विनयका प्रयोग किया गया है इस रीतिसे अन्तिम कुलकर महाराज भरतको बार-बार प्रसन्न करता हआ बाहुबली अपने संकल्पसे पीछे नहीं हटा सो ठीक ही है क्योंकि तेजस्वी पुरुषों की स्थिरता भी आश्चर्यजनक होती है ॥१०३।। उसने अपने पुत्र महाबलीको राज्यलक्ष्मी सौंप दी और स्वयं गुरुदेवके चरणोंकी आराधना करते हुए जैनी दीक्षा धारण कर ली ॥१०४॥ जिसने समस्त परिग्रह छोड़ दिया है तथा जो दीक्षा रूपी लतासे आलिङ्गित हो रहा है ऐसा वह बाहुबली उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो पत्तों के गिर जानेसे कुश लतायुक्त कोई वृक्ष ही हो ॥१०५।। गुरुकी आज्ञामें रहकर शास्त्रों का अध्ययन करनेम कुशल तथा एक विहारीपन धारण करनेवाले जितेन्द्रिय बाहुबलीने एक वर्षतक प्रतिमा योग धारण किया अर्थात् एक ही जगह एक ही आसनसे खड़े रहने का नियम लिया ।।१०६॥ जिन्होंने प्रशंसनीय व्रत धारण किये हैं, जो कभी भोजन नहीं करते, और जिनके समीपका प्रदेश वनकी लताओंसे व्याप्त हो रहा है ऐसे वे बाहुबली वामीके छिद्रोंसे ते हए सर्कोसे बहत ही भयानक हो रहे थे ॥१०७।। जिनके फणा प्रकट हो रहे हैं ऐसे फुकारते हुए सर्पके बच्चोंकी उछल-कूदसे चारों ओरसे घिरे हुए वे बाहुबली ऐसे सुशोभित निकलते १ क्षम्यताम् । २ अपराधः । ३ भृशमपश्यम् । ४ प्रवाहः । ५ भरतस्य । ६ दुष्ठु ट० । गिन्दा । 'निन्दायां दुष्टु सुष्ठ प्रशंसने।' इत्यभिधानात् । ७निजवैराग्यादित्यर्थः । ८ आलिडिगतः । ६ लतया सहितः । १० पर्णमोचनकृशः । ११ अधीतवान् । १२ वर्षावधि । १३ निभृतः । १४ स्तुत । १५ उपवासी। १६ भयङ्करः । १७ उच्छवसत् । १८ फरण। १६ अडिनसमीप । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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