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________________ २०२ महापुराणम् भूरेणवस्तदाश्वीयखुरोद्धृताः खलङघिनः । क्षणविनितसंप्रेक्षाः प्रचारमराङगनाः ॥२२॥ रजः सन्तमसे रुद्धदिक्चक्र व्योमलङधिनि । चक्रोद्योतो नणां चके दृशः स्वविषयोन्मुखीः ॥२३॥ समुद्भटरसप्रायः' भटालापमहीश्वराः । प्रयाणके ति प्रापुः जनजल्परपीदर्शः ॥२४॥ रणभूमि "प्रसाध्यारात् स्थितो बाहुबली न पः । अयं च तपशार्दूलः प्रस्थितो निनियन्त्रणः ॥२५॥ न विघ्नः किन्नु खल्वत्र स्याद् भ्रात्रोरनयोरिति । प्रायो न शान्तये युद्धम् एनयोरनुजीविनाम् ॥२६॥ विरूपकमिदं युद्धम् आरब्धं भरतेशिना । ऐश्वर्यमददुर्वाराः स्वैरिणः प्रभवोऽथवा ॥२७॥ इमे मकुटबद्धाः किं नैनौ वारयित क्षमाः । येऽमी समग्रसामग्रया सङग्रामयितुमागताः ॥२८॥ अहो महानुभावोऽयं कुमारो भुजविक्रमी। क्रुद्ध चक्रधरेऽप्येवं यो योद्ध सम्मुखं स्थितः ॥२६॥ १३अथवा तन्त्रभूयस्त्वं न जयाङगं मनस्विनः। नन सिंहो जयत्येकः संहितानपि दन्तिनः ॥३०॥ अयं च चक्रभृद् देवो नेष्टः सामान्यमानुषः । योऽभिरक्ष्यः सहस्रेण प्रणम्राणां सधाभुजाम् ॥३१॥ "तन्मा भूदनयोर्युद्धं जनसङक्षयकारणम् । कुर्वन्तु देवताः शान्ति यदि सन्निहिता इमाः ॥३२॥ इति माध्यस्थ्यवृत्त्यैके८ जनाः श्लाघ्यं वचो जगुः । पक्षपातहताः केचित् स्वपक्षोत्कर्षगुज्जगुः ॥३३॥ युद्धका प्रारम्भ सुनकर जिनके चित्त व्याकुल हो रहे हैं ऐसी स्त्रियोंको वीर योद्धा बड़ी धीरताके साथ समझाकर आश्वासन दे रहे थे ॥२१॥ उस समय घोड़ोंके खुरोंसे उठी हुई और आकाशको उल्लंघन करनेवाली पृथिवीकी धूल क्षण भरके लिये देवांगनाओंके देखने में भी बाधा कर रही थी ॥२२॥ समस्त दिशाओंको व्याप्त करनेवाले और आकाशको उल्लंघन करनेवाले उस धूलिसे उत्पन्न हुए अन्धकारमें चक्ररत्नका प्रकाश ही मनुष्योंके नेत्रोंको अपना अपना विषय ग्रहण करने के सन्मुख कर रहा था ॥२३॥ राजा लोग रास्ते में अत्यन्त उत्कट वीररससे भरे हुए योद्धाओंके परस्परके वातलिापसे तथा इसी प्रकारके अन्य लोगोंकी बातचीतसे ही उत्साहित हो रहे थे ।।२४।। उधर राजा बाहुबली रणभूमिको दूरसे ही युद्धके योग्य बनाकर ठहरे हुए हैं और इधर राजाओंमें सिंहके समान तेजस्वी महाराज भरत भी यन्त्रणारहित (उच्छङखल) होकर उनके सन्मुख जा रहे हैं ॥२५॥ नहीं मालम इस यद्धमें इन दोनों भाइयोंका क्या होगा ? प्रायः कर इनका यह युद्ध सेवकोंकी शान्तिके लिये नहीं है । भावार्थइस युद्ध में सेवकोंका कल्याण दिखाई नहीं देता है ॥२६॥ भरतेश्वरने यह युद्ध बहुत ही अयोग्य प्रारम्भ किया हे सो ठीक ही है क्योंकि जो ऐश्वर्य के मदसे रोक नहीं जा सकते ऐसे प्रभ लोग स्वेच्छाचारी ही होते हैं ॥२७।। जो ये मुकुटबद्ध राजा समस्त सामग्रीके साथ युद्ध करनेके लिये आये हुए हैं वे क्या इन दोनोंको नहीं रोक सकते हैं ? ॥२८॥ अहो, भुजाओंका पराक्रम रखनेवाला यह कुमार वाहुबली भी महाप्रतापी है जो कि चक्रवर्तीके कुपित होनेपर भी इस प्रकार यद्धके लिये सन्मख खडा हआ है ॥२९॥ अथवा शरवीर लोगोंको सामग्रीकी अधिकता विजयका कारण नहीं है क्योंकि एक ही सिंह झुण्डके झुण्ड हाथियोंको जीत लेता है ॥३०॥ नमस्कार करते हुए हजारों देव जिसकी रक्षा करते हैं ऐसा यह चक्रको धारण करनेवाला भरत भी साधारण पुरुष नहीं है ।।३१।। इसलिये जो अनेक लोगों के विनाशका कारण है ऐसा इन दोनोंका युद्ध नहीं हो तो अच्छा है, यदि देव लोग यहां समीपमें हों तो वे इस युद्धकी शान्ति करें॥३२।। इस प्रकार कितने ही लोग मध्यस्थ भावसे प्रशंगनीय वचन कह रहे थे १ आकाशलङघिनः । २ आलोकनाः। ३ रजोऽन्धकार। ४ वीररसवहुलैः । ५ अलङ्कृत्वा । ६ समीपे । ७ नृपयेष्ठः भरत इत्यर्थः । ८ निरङकुशः । ६ भटानाम् । १० कष्टम् । ११ –बो यतः ल० । १२ युद्ध कारयितुम् । १३ तथाहि । १४ सेनाबाहुल्यम् । १५ संयुक्तान् १६ देवानाम् । १७ तत् कारणात् । १८ अन्ये । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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