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________________ १९८ महापुराणम् जयति तरुरशोको दुन्दुभिः पुष्पवर्ष चमरिरुहसमेतं विष्टरं सहमुद्धम्' । वचनमसममुच्चै रातपत्रं च तेजः Jain Education International त्रिभुवनजयचिह्नं यस्य सार्वो जिनोऽसौ ॥ २४४ ॥ जयति जननतापच्छेदि यस्य क्रमाब्जं विपुलफलदमारान्नमूनाकीन्द्रभृङ्गम् । समुपनतजनानां प्रीणनं कल्पवृक्ष स्थितिमतनु महिम्ना सोऽवतात्तीर्थ कृद्रः ॥ २४५॥ नवर भरतराज्योऽप्यू जितस्यास्य युष्म द्भुजपरिघयुगस्य प्राप्नुयान्नैव कक्षाम् । भुजबलमिदमास्तां दृष्टिमात्रेऽपि कस्ते रणनिषकगतस्य स्थातुमीशः क्षितीशः ॥ २४६॥ तदलमधिप कालक्षेपयोगेन निद्रां जहिहि महति कृत्ये 'जागरूक स्त्वमेधि । सपदि च जयलक्ष्मीं प्राप्य भूयोऽपि देवं जिनम' वनम भक्त्या शासितारं जयाय ॥ २४७ ॥ हरिणीच्छन्दः इति समुचित रुच्चै रुच्चाव चर्जयमङगलैः सुघटितपदैर्भूयोऽमीभिर्जयाय विबोधितः । शयनममुचनिद्रापायात् स पार्थिवकुञ्जरः सुरगज इवोत्सङगं गङगाप्रतीरभुवः शनैः ॥ २४८ ॥ के लिये समर्थ नहीं हो सका तथा जिनके सामने देवोंको जीतनेसे जिसका अहंकार बढ़ गया है ऐसा कामदेव भी शस्त्र और सामर्थ्य के कुण्ठित हो जानेसे हृदयमें अहंकार धारण नहीं कर सका ऐसे अचिन्त्य प्रभावके धारक वे प्रसिद्ध जिनेन्द्रदेव सदा जयवन्त रहें ।। २४३|| अशोक वृक्ष, दुन्दुभि, पुष्पवृष्टि, चमर, उत्तम सिंहासन, अनुपम वचन, ऊंचा छत्र और भामण्डल ये आठ प्रातिहार्य जिनके तीनों लोकोंको जीतने के चिह्न हैं वे सबका हित करनेवाले श्री वृषभजिनेन्द्र सदा जयवन्त रहें || २४४ || जिनके चरणकमल जन्मरूप संतापको नष्ट करनेवाले हैं, स्वर्ग मोक्ष आदि बड़े बड़े फल देनेवाले हैं, दूरसे नमस्कार करते हुए इन्द्र ही जिनके भूमर हैं और जो शरण में आये हुए लोगोंको कल्पवृक्ष के समान संतुष्ट करनेवाले हैं ऐसे वे तीर्थ कर भगवान् सदा विजयी हों और अपने विशाल माहात्म्यसे तुम सबकी रक्षा करें ॥ २४५ ॥ हे पुरुषोत्तम, महाराज भरत भी आपके दोनों भुजारूपी अर्गलदण्डोंकी तुलना नहीं प्राप्त कर सकते हैं, अथवा भुजाओं का बल तो दूर रहे, जब आप युद्धके निकट जा पहुँचते हैं तब आपके देखने मात्र से ही ऐसा कौन राजा है जो आपके सामने खड़ा रहने के लिये समर्थ हो सके ॥ २४६॥ इसलिये हे अधीश्वर, समय व्यतीत करना व्यर्थ है, निद्रा छोड़िये, इस महान् कार्य में सदा जागरूक रहिये और शीघ्र ही विजयलक्ष्मीको पाकर अन्य सब जगह विजय प्राप्त करनेके लिये सबपर शासन करनेवाले देवाधिदेव जिनेन्द्रदेवको भक्तिपूर्वक फिरसे नमस्कार कीजिये || २४७॥ इस प्रकार जिनमें अच्छे अच्छे पदोंकी योजना की गई है ऐसे अनेक प्रकारके १ प्रशस्तम् । २ प्रभामण्डलम् । ३ सर्वहितः । ४ समानताम् । ५ तत् कारणात् । ६ जागरणशीलः । ८ नमस्कुरु । ६ नानाप्रकारैः | ७ भव । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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