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________________ पञ्चत्रिंशत्तम पर्व १९५ अयमनुसरन कोकः कान्तां तटान्तरशायिनीम् अविरलगलद्वाष्पव्याजादिवोत्सृजतीं शुचम् । विशति बिसिनीपत्रच्छन्नां सरोजसरस्तटों सरसिजरजःकीणों पक्षौ विध्य शनैः शनैः ॥२३०॥ जरठबिसिनीकन्दच्छायामुषस्तरलास्त्विष स्तुहिनकिरणो दिक्पर्यन्तादयं प्रतिसंहरन् । अनुकुमुदिनीषण्डं तन्वन् करानमृतश्च्यतो बढयति परिष्वङगासंङगं वियोगभयादिव ॥२३॥ तिमिरकरिणां यथं भित्वा तदरपरिप्लुता मिव तनु मयं बिभच्छोणां निशाकरकेसरी। वनमिव नभः क्रान्त्वाऽस्ताद्रेर्गुहागहनान्यतः श्रयति नियतं 'निद्रासङगाद् विजिह्मिततारकः ॥२३२॥ सरति सरसीतीरं हंसः ससारसकूजितं ___झटिति घटते कोकद्वन्द्वं विशापमिवाधुना । पतति' पततां वन्दं विष्वक् द्रुमेषु कृतारुतं गतमिव जगत्प्रत्यापत्तिं समुद्यति भास्वति ॥२३३॥ उदयशिखरिणावश्रेणीसरोरुहरागिणी गगनजलधेरातन्वाना प्रवालवनश्रियम् । दिगिभवदन सिन्दूरश्रीरलक्तकपाटला ___ प्रसरतितरां सन्ध्यादीप्तिदिगाननमण्डनी ॥२३४॥ अगवानी ही कर रहे हों ॥२२९।। इधर देखिये, जो दूसरे किनारेपर सो रही है और निरन्तर बहते हुए आँसुओंके बहानेसे जो मानो शोक ही छोड़ रही है ऐसी अपनी स्त्री चकवीके पीछे पीछे जाता हुआ यह चकवा कमलोंके परागसे भरे हुए अपने दोनों पंखोंको झटकाकर कमलिनियोंके पत्तोंसे ढके हुए कमलसरोवरके तटपर धीरे धीरे प्रवेश कर रहा है ॥२३०। यह चन्द्रमा पके हुए मृणालकी कान्तिको चुरानेवाली अपनी कान्तिको सब दिशाओंके अन्तसे खींच रहा है तथा अमृत बरसानेवाली अपनी किरणोंको प्रत्येक कुमुदिनियोंके समूहपर फैलाता हुआ वियोगके डरसे ही मानो उनके साथ आलिङ्गनके सम्बन्धको दृढ़ कर रहा है ॥२३॥ जो अन्धकाररूपी हाथियोंके समूहको भेदन कर उनके रक्तसे ही तर हुएके समान लाल लाल दिखनेवाले शरीर (मण्डल) को धारण कर रहा है तथा नींद आ जानेसे जिसकी नक्षत्ररूपी आंखोंकी पुतलियां तिरोहित अथवा कुटिल हो रही हैं ऐसा यह चन्द्रमारूपी सिंह वनके समान आकाशको उल्लंघन कर अब अस्ताचलकी गहारूप एकान्त स्थानका निश्चित रूपसे आश्रय ले रहा है ।।२३२।। सूर्य उदय होते ही हंस, सारस पक्षियोंकी बोलीसे सहित सरोवरके किनारे पर जा रहे हैं, चकवा चकवियोंके जोड़े परस्परमें इस प्रकार मिल रहे हैं मानो अब उनका शाप ही दूर हो गया हो, पक्षियोंके समूह चारों ओर शब्द करते हुए वृक्षोंपर पड़ रहे हैं और यह जगत् फिरसे अपने पहले रूपको प्राप्त हुआ सा जान पड़ता है ॥२३३॥ उदयाचलकी चट्टानोंपर पैदा होनेवाले कमलोंके समान लाल तथा आकाशरूपी समुद्रमें मूंगाके वनकी १ अभिनिवेशात् । २ वक्रिततारकः । अक्षःकनीनिकेति ध्वनिः । ३ विगतशापम् । आक्रोशमित्यर्थः। ५ आश्रयति । ५ पक्षिणाम् । ६ कृतसमन्ताद् ध्वनिः। कृतारवं ल०। ७पूर्वस्थितिम् । ८ उदिते सति । ६ आदित्यं । १० विद्रुमं । ११ मण्डयतीति मण्डनी। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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