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________________ १६४ महापुराणम् तमः कवाटमुद्घाटय दिङमुखानि प्रकाशयन् । जगदुद्धाटिताक्षं वा व्यधादुष्णकरः करैः ॥२२४॥ 'प्रातस्तरामथोत्थाय पद्माकरपरिग्रहम् । तन्वन् भानुः प्रतापेन जिगीषोवृत्तिमन्वगात् ॥२२॥ सुकण्ठा पेठुरत्युच्चः प्रभोः प्राबोधिकास्तदा । स्वयं प्रबुद्धमप्येनं प्रबोधेन युयुक्षवः ॥२२६॥ हरिणीच्छन्दः अशिशिरकरो लोकानन्दी जनैरभिनन्दितो बहुमतकरं तेजस्तन्वग्नितोऽयमुदेष्यति । नवर जगतामुद्योताय त्वमप्युदयोचितम् विधिमनुसरन् शय्योत्सङगं जहीहि मुदे श्रियः ॥२२७॥ कतरकतमें नाकान्तास्ते बलैर्बलशालिनो भुजबलमिदं लोकः प्रायो न वेत्ति तवाल्पकः । भरतपतिना सार्द्ध युद्ध जयाय कृतोद्यमो न पवर भवान् भूयाद् भर्ता नवीरजयश्रियः ॥२२८॥ रविरविरलानधन जातानिवाश्रमशाखिना तुहिनकणिकपातानाशु प्रमृज्य करोत्करैः। अयमुदयति प्राप्तानन्दरितोऽम्बुजिनीवनः उदयसमय प्रत्युद्यातोर धृतार्घमिवाऽम्बुजः ॥२२६॥ होते ही चांदनीकी शोभाको भी चुराता जाता था-नष्ट करता जाता था ॥२२३॥ सूर्यने अपने किरणरूपी हाथोंसे अन्धकाररूपी किवाड खोलकर दिशाओंके मह प्रकाशित कर दिये थे और समस्त जगत्के नेत्र खोल दिये थे ॥२२४।। वह सर्य विजयकी इच्छा करनेवाले किसी राजाकी वृत्तिका अनुकरण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार विजयकी इच्छा करनेवाला राजा बड़े सबेरे उठकर अपने प्रतापसे पद्माकर अर्थात् लक्ष्मीका हाथ स्वीकार करता है उसी प्रकार सूर्य भी बड़े सबेरे उदय होकर अपने प्रतापसे पद्माकर अर्थात् कमलोंके समुहको स्वीकार कर रहा था-अपने तेजसे उन्हें विकसित कर रहा था ॥२२५॥ यद्यपि उस समय महाराज बाहुबली स्वयं जाग गये थे तथापि उन्हें जगानेका उद्योग करते हुए सुन्दर कण्ठवाले बंदीजन जोर जोरसे नीचे लिखे हुए मंगलपाठ पढ़ रहे थे ॥२२६।। हे पुरुषोत्तम, जो लोगोंको आनन्द देनेवाला है और लोग जिसकी प्रशंसा कर रहे हैं ऐसा यह सूर्य सब लोगोंको अच्छा लगनेवाले तेजको फैलाता हुआ इधर पूर्व दिशासे उदय हो रहा है इसलिये आप भी जगत्को प्रकाशित और लक्ष्मीको आनन्दित करनेके लिये सर्योदयके समय होनेवाली योग्य क्रियाओंको करते हए शय्याका मध्यभाग छोड़िये ॥२२७॥ हे राजाओंमें श्रेष्ठ, आपकी सेनाओंने कितने कितने बलशाली राजाओंपर आक्रमण नहीं किया है, ये छोटे छोटे लोग प्रायः आपकी भुजाओंके बलको जानते भी नहीं हैं। हे नरवीर, आपने भरतेश्वरके साथ युद्धमें विजय प्राप्त करनेके लिये उद्यम किया है इसलिये विजयलक्ष्मीके स्वामी आप ही हों ।।२२८॥ हे देव, बगीचेके वृक्षोंपर पड़ी हुई ओसकी बूदोंको निरन्तर पड़ते हुए आंसुओंके समान अपनी किरणोंके समूहसे शीघ्र ही पोंछता हुआ यह सूर्य उदय हो रहा है और उदय होते समय ऐसा जान पड़ता है मानो कमलिनियोंके वन जिन्हें आनन्द प्राप्त हो रहा है ऐसे कमलोंके द्वारा अर्घ्य लेकर उसकी १ विवृतनेत्रम् । २ अतिशयप्रातःकाले। ३ अनुकरोति स्म । ४ प्रबोधन-द०, ल० । ५ योक्तुमिच्छवः । ६ अनुगच्छन् । ७ के के। ८ तव। ६ -नथुवाता-द० । १० -कापाता-ल०, द० । ११ प्रतिगृहीतः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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