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________________ १६८ महापुराणम् अदीनमनसः शान्ताः परमोपेक्षयान्विताः। मुक्तिशाठ्यास्त्रिभिर्गुप्ताः कामभोगेष्वविस्मिताः ॥१६॥ जिनाज्ञानु गताः शश्वत्संसारोद्विग्नमानसाः। गर्भवास जरामत्युपरिवर्तनभीरवः ॥१६६॥ श्रुतज्ञानदृशो दृष्टपरमार्था विचक्षणाः । ज्ञानदीपिकया साक्षाच्चक्रुस्ते पदमक्षरम् ॥१७॥ ते चिरं भावयन्ति स्म सन्मार्ग मुक्तिसाधनम् । परदत्तविशुद्धान्नभोजिनः पाण्यमत्रकाः ॥१६॥ शङकिताभिहतो द्दिष्ट क्रयक्रीतादि लक्षणम् । सूत्रे निषिद्धमाहारं नैच्छन्प्राणात्ययेऽपि ते ॥१६॥ भिक्षा नियतवेलायां गहपडक्त्यनतिक्रमात् । शुद्धामाददिरे धीरा मुनिवृत्तौ समाहिताः ॥२०॥ शीतमुष्णं विरुक्षं च स्निग्धं सलवणं न वा । तनुस्थित्यर्थमाहारमाजहस्ते० गतस्पृहाः ॥२०१॥ अक्षमक्षणमात्रं ते प्राणधृत्य' विषष्वणुः१२ । धर्मार्थमेव च प्राणान् धारयन्ति स्म केवलम् ॥२०२॥ न तुष्यन्ति स्म ते लब्धौ व्यषीदन्नाप्यलब्धितः । मन्यमानास्तपोलाभमधिकं धुतकल्मषाः ॥२०३॥ काय, पृथिवीकाय, जलकाय, वायु काय और अग्नि काय इन छह कायके जीवोंकी बड़े यत्न से रक्षा करते थे ।।१९४।। उन मुनियोंका हृदय दीनतासे रहित था, वे अत्यन्त शान्त थे, परम उपेक्षासे सहित थे, मोक्ष प्राप्त करना ही उनका उद्देश्य था, तीन गुप्तियोंके धारक थे और काम भोगोंमें कभी आश्चर्य नहीं करते थे ॥११५।। वे सदा जिनेन्द्रदेवकी आज्ञाके अनुसार चला करते थे, उनका हृदय संसारसे उदासीन रहा करता था और वे गर्भ में निवास करना, बढापा और मत्य इन तीनोंके परिवर्तनसे सदा भयभीत रहते थे ।।१९६॥ श्रतज्ञान ही जिनके नेत्र हैं और जो परमार्थको अच्छी तरह जानते हैं ऐसे वे चतुर मुनिराज ज्ञानरूपी दीपिका के द्वारा अविनाशी परमात्मपदका साक्षात्कार करते थे ॥१९७।। जो दूसरेके द्वारा दिये हुए विशुद्ध अन्नका भोजन करते हैं तथा हाथ ही जिनके पात्र हैं ऐसे वे मुनिराज मोक्षके कारणस्वरूप समीचीन मार्गका निरन्तर चिन्तवन करते रहते थे ॥१९८॥ शंकित अर्थात् जिसमें ऐसी शंका हो जावे कि यह शुद्ध है अथवा अशुद्ध, अभिहत अर्थात् जो किसी दूसरेके यहांसे लाया गया हो, उद्दिष्ट अर्थात् जो खासकर अपने लिये तैयार किया गया हो, और ऋयक्रीत अर्थात् जो कीमत देकर बाजारसे खरीदा गया हो इत्यादि आहार जैन शास्त्रोंमें मुनियोंके लिये निषिद्ध बताया है। वे मुनिराज प्राण जानेपर भी ऐसा निषिद्ध आहार लेनेकी इच्छा नहीं करते थे ॥१९९॥ मुनियोंकी वृत्तिमें सदा सावधान रहनेवाले वे धीरवीर मुनि घरोंकी पंक्तियोंका उल्लंघन न करते हुए निश्चित समयमें शुद्ध भिक्षा ग्रहण करते थे ॥२००। जिनकी लालसा नष्ट हो चुकी है ऐसे वे मुनिराज शरीरकी स्थितिके लिये ठंडा, गर्म, रूखा, चिकना, नमकसहित अथवा बिना नमकका जैसा कुछ प्राप्त होता था वैसा ही आहार ग्रहण करते थे ॥२०१।। वे मुनि प्राण धारण करने के लिये अक्षमूक्षण मात्र ही आहार लेते थे और केवल धर्मसाधन करने के लिये ही प्राण धारण करते थे। भावार्थ-जिस प्रकार गाड़ी ओंगनेके लिये थोड़ी सी चिकनाईकी आवश्यकता होती है भले ही वह चिकनाई किसी भी पदार्थकी हो इसी प्रकार शरीररूपी गाडीको ठीक ठीक चलाने के लिये कुछ आहारकी आवश्यकता होती है भले ही वह सरस या नीरस कैसा ही हो । अल्प आहार लेकर मुनिराज शरीरको स्थिर रखते हैं और उससे संयम धारण कर मोक्षकी प्राप्ति करते हैं वे मुनिराज भी ऐसा ही करते थे ॥२०२।। वे पाप रहित मुनिराज, आहार मिल जानेपर संतुष्ट नहीं होते थे और नहीं मिलने पर तपश्चरण १ मक्तसाध्या अ०, प०, इ०, स० । मुक्तिसाध्या ल०। २ जन्म । ३ पाणिपालकाः द०, लक, स०. इ० । पाणिपूटभाजनाः । ४ स्थूलतण्डलाशनादिकं दत्त्वा स्वीकृत कलमौदनादिक । ५ आ ६ पणादिकं दत्वा स्त्रीकृतम् । ७ परमागमे । ८ निषेधितम् । ६ यत्याचारे। १० आददुः । ११ प्राणधारणार्थम् । १२ भुजते रम। १३ धर्म-निमित्तम् । १४ लाभे सति । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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