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________________ १५४ महापुराणम् तथापि त्वत्कृतोऽस्मासु सत्कारोऽनन्यगोचरः । तनोति गौरवं लोके ततः स्मो वक्तुमुद्यताः ॥३५॥ इत्यनुश्रुतमस्माभिर्देव दैवज्ञशासनम् । नास्ति चक्रस्य विश्रान्तिः सावशेष दिशां जये ॥३६॥ ज्वलचिः करालं वो जैत्रमस्त्रमिदं ततः । संस्तम्भितमिवातक्यं पुरद्वारि विलम्बते ॥३७॥ अरिमित्रममित्र मित्रमित्रमिति श्रुतिः । श्रुतिमात्र स्थिता देव प्रजास्त्वय्यनुशासति ॥३८॥ तथाण्यस्त्येव जेतव्यः पक्षः कोऽपि तवाधुना । योऽन्तगृहे कृतोत्थानः कुरो रोग इवोदरे ॥३६॥ बहिर्मण्डलमवासीत् परिक्रान्तमिदं स्वया । अन्तर्मण्डलसंशुद्धिर्मनाग्नाद्यापि जायते ॥४०॥ जितजेतव्यपक्षस्य न नम्ना भातरस्तव । व्युत्थिताश्च सजातीया विघाताय न न प्रभोः ॥४१॥ स्वपक्षरेव तेजस्वी महानप्युपरुद्धयते प्रत्यर्कमर्ककान्तेन ज्वलतेदमुदाहृतम् ॥४२॥ विबलोऽपि सजातीयो लब्ध्वा तीक्ष्णं प्रतिष्कसम् । दण्डः परश्वधस्येव निबर्हयति पार्थिवम् ॥४३॥ भातरोऽमी तवाजय्या बलिनो मानशालिनः। श्यवीयांस्तेष धौरयो धीरो बाहबली बली ॥४४॥ एकान्नशत संख्यास्ते सोदर्या वीर्यशालिनः । प्रभोरादिगुरोर्नान्यं प्रणमाम इति स्थिताः ॥४५॥ आपके ही सामने उसका प्रयोग करते हुए क्यों न लज्जित हों ॥३४।। तथापि आपके द्वारा किया हुआ हमारा असाधारण सत्कार लोकमें हमारे गौरवको बढ़ा रहा है इसलिये ही मैं कुछ कहने के लिये तैयार हआ हँ॥३५॥ हे देव, हम लोगोंने निमित्तज्ञानियोंका ऐसा उपदेश सना है कि जबतक दिग्विजय करना कुछ भी बाकी रहता है तब तक चक्ररत्न विश्राम नहीं लेता अर्थात् चक्रवर्तीकी इच्छाके विरुद्ध कभी भी नहीं रुकता है ॥३६॥ जो जलती हुई ज्वालाओं से भयंकर है ऐसा वह आपका विजयी शस्त्र नगरके द्वारपर गुप्त रीतिसे रोके हुएके समान अटक कर रह गया है ॥३७॥ हे देव, आपके प्रजाका शासन करते हुए शत्रु, मित्र, शत्रुका मित्र, और मित्रका मित्र ये शब्द केवल शास्त्रमें ही रह गये हैं अर्थात् व्यवहार में न आपका कोई मित्र है और न कोई शत्रु ही है सब आपक संवक हैं ।।३८॥ तथापि अब भी कोई आपके जीतने योग्य रह गया है और वह उदरमें किसी भयंकर रोगके समान आपके घरमें ही प्रकट हुआ है ॥३९॥ आपके द्वारा यह बाह्यमण्डल ही आक्रान्त-पराजित हुआ है परन्तु अन्तर्मण्डलकी विशुद्धता तो अब भी कुछ नहीं हुई है। भावार्थ-यद्यपि आपने बाहरके लोगोंको जीत लिया है तथापि आपके घरके लोग अब भी आपके अनुकूल नहीं हैं ॥४०॥ यद्यपि आपने समस्त शत्रु पक्षको जीत लिया है तथापि आपके भाई आपके प्रति नम नहीं हैं-उन्होंने आपके लिये नमस्कार नहीं किया है। वे आपके विरुद्ध खड़े हुए हैं और सजातीय होनेके कारण आपके द्वारा विघात करने योग्य भी नहीं हैं ॥४१॥ तेजस्वी पुरुष बडा होनेपर भी अपने सजातीय लोगों के द्वारा रोका जाता है यह बात सूर्यके सन्मुख जलते हुए सूर्यकान्त मणिके उदाहरणसे स्पष्ट है ॥४२।। सजातीय पुरुष निर्बल होनेपर भी किसी बलवान् पुरुषका आश्रय पाकर राजा का उस प्रकार नष्ट कर देता है जिस प्रकार निर्वल दण्ड कल्हाड़ीका तीक्ष्ण आश्रय पाकर अपने सजातीय वृक्ष आदिको नष्ट कर देता है ॥४३।। ये आपके बलवान् तथा अभिमानी भाई अजेय हैं और इनमें भी अतिशय युवा धीर वीर तथा बलवान् बाहुबली मुख्य है ।।४४॥ आपके ये निन्यानबे भाई बड़े बलशाली हैं, हमलोग भगवान् आदिनाथको छोड़कर और १ विभिन्नशास्त्रम् । २ -मिवात्यर्थ स० इ०, अ० । -मिवाव्यक्तं प०, ल० । ३ विरुद्धाचरणाः । ४ बाध्यते । ५ सूर्यकान्तपाषाणेन । ६ उदाहरणं कृतम् । ७ प्रतिश्रयम् प०, ल० । सहायम् । ८ परशोः । 'परशुश्च परश्वधः' इत्यभिधानात् । ६ नाशयति (लूष बर्ह हिसायाम्)। १० पृथिव्यां भवम् । वृक्ष नृपञ्च । ११ कनिष्ठः। 'जघन्यजे स्युः कनिष्ठयवीयोऽवरजानुजाः' इत्यभिधानात् । १२ एकोन--ल०, द०, इ०, प० । १३ बाहुबलिना रहितेन सह इयम् । संख्या-वृषभसेनेन प्रागेव दीक्षावग्रहणात् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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