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________________ १३२ महापुराणम् कैलासाचलमम्यम् प्रथालोक्य रथाडगभूत् । निवेश्य निकटे सैन्यं प्रययौ जिनचितुम् ॥१२॥ प्रयान्तमनुजग्मुस्तं भरतेशं महाद्युतिम् । रोचिष्णुमौलयः क्षमायाः सौधर्मेन्द्रमिवामराः ॥१३॥ अचिराच्च तमासाद्य शरदम्बरसच्छविम् । जिनस्येव यशोराशिम् अभ्यनन्दद्विशाम्पतिः ॥१४॥ निपतन्निर्भरारावैः आह्वयन्तमिवामरान् । त्रिजगद्गुरुमेत्यारात् सेवध्वमिति सादरम् ॥१५॥ मरुदान्दोलितोदग्रशाखाप्रैस्तटपादपैः । प्रतोषादिव नृत्यन्तं विकासिकुसुमस्मितः ॥१६॥ तटनिझरसम्पातः दातु पाद्यमिवोद्यतम् । वन्दारों व्यवृन्दस्य विष्वगास्कन्दतो जिनम् ॥१७॥ शिखरोल्लिखिताम्भोदपटलोद्गीवारिभिः। दावभीत्येव सिञ्चन्तं स्वपर्यन्तलतावनम् ॥१८॥ शचिग्राव विनिर्माणः शिखरः स्थगिताम्बरः । गतिप्रसरमर्कस्य न्यक्कुर्वाणमिवोच्छितः ॥१६॥ क्वचित् किन्नरसम्भोग्यः" क्वचित् पन्नगसेवितैः । क्वचिच्च 'खचराक्रीडः' वनराविष्कृतश्रियम् ॥२०॥ क्वचिद्विरलनीलांशुमिलितैः स्फटिकोपलैः । शशाङकमण्डलाशडाकाम् पातन्वन्तं० नभोजुषाम् ॥२१॥ हरिन्मणिप्रभाजालैः भाजालश्च प्रभाश्मनाम्। क्वचिदिन्द्रधनुर्लेखाम् आलिखन्तं नभोऽङगणे ॥२२॥ क्रमसे कैलास पर्वतके समीप जा पहुंची ॥११॥ तदनन्तर चक्रवर्तीने कैलास पर्वतको समीप ही देखकर सेनाओंको वहीं पासमें ठहरा दिया और स्वयं जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करनेके लिये प्रस्थान किया ॥१२।। जिस प्रकार सौधर्म इन्द्रके पीछे पीछे देदीप्यमान मुकुटको धारण करनेवाले अनेक देव जाते हैं उसी प्रकार आगे आगे जाते हुए अतिशय कान्तिमान् महाराज भरतके पीछे पीछे देदीप्यमान मुकुटको धारण करनेवाले अनेक राजा लोग जा रहे थे ।।१३।। जिसकी कान्ति शरद्ऋतुके बादलोंके समान है और इसीलिये जो जिनेन्द्र भगवान्के यशके समूहके समान जान पड़ता है ऐसे उस कैलास पर्वतको बहुत शीघू पाकर महाराज भरत बहुत ही प्रसन्न हुए ॥१४॥ जो पड़ते हुए झरनोंके शब्दोंसे ऐसा जान पड़ता है मानो समीप आकर तीनों जगत्के गुरु भगवान् वृषभदेवकी सेवा करो इस प्रकार देव लोगोंको आदरपूर्वक बुला ही रहा हो-जिनकी ऊँची ऊँची शाखाओंके अग्रभाग वायुके द्वारा हिल रहे हैं और जिनपर फूले हुए फूल उनके मन्द हास्यके समान मालूम होते हैं ऐसे अपने किनारेपर के वृक्षोंसे जो ऐसा जान पड़ता है मानो सन्तोषसे नृत्य ही कर रहा हो-जो किनारोंपरसे झरनोंके पड़नेसे ऐसा जान पड़ता है मानो जिनेन्द्र भगवान्की वन्दना करने के लिये चारों ओरसे आते हुए भव्य जीवों के समूहके लिये पैर धोनेके लिये जल देनेको ही उद्यत हुआ हो-जो शिखरोंसे विदीर्ण हुए बादलोंके समूहसे गिरते हुए जलसे ऐसा जान पड़ता है मानो दावानलके डरसे अपने समीपवर्ती लताओंके वनको सींच ही रहा हो-जो स्फटिक मणिके सफेद पत्थरोंसे बने हुए और आकाश को घेरनेवाले अपने ऊँचे ऊँचे शिखरोंसे ऐसा जान पड़ता है मानो सूर्यकी गतिके फैलावको रोक ही रहा हो-जिनमें कहीं तो किन्नर जातिके देव संभोग कर रहे हैं, कहीं नागकुमार जाति के देव सेवा कर रहे हैं और कहीं विद्याधर लोग क्रीड़ा करते हैं ऐसे अनेक वनोंसे जिसकी शोभा प्रकट हो रही है जो कहींपर कुछ कुछ नीलमणियोंकी किरणोंसे मिले हुए स्फटिक मणियोंके पत्थरोंसे देवोंको चन्द्रमण्डलकी आशंका उत्पन्न करता रहता है। जो कहींपर हरे रंगके मणियों की प्रभाके समहसे और स्फटिक मणियोंकी प्रभाके समूहसे आकाशरूपी आंगनमें इन्द्रधनुष की रेखा लिख रहा था। कहींपर पद्मराग मणियोंकी किरणोंसे मिले हुए स्फटिक मणियोंकी किरणोंसे जिसके किनारे का समीपभाग कुछ कुछ लाली लिये हुए सफेद रंगका हो गया है और १ कैलासम् । २ वन्दनशीलस्य । ३ आगच्छतः । ४ विदारित । ५ उद्गत । ६ स्फटिकपाषाण । ७ सम्भोगः द०, अ०, स० । ८ खेचरा-प० । ६ खचराणाम् आसमन्तात् क्रीड़ा येषु तानि । १० मातन्वानं-द०, ल०, अ०, स०, इ० । ११ पद्मरागाणाम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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