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________________ द्वात्रिंशत्तमं पर्व १२१ धेहि देव ततोऽस्मास प्रसादतरलां दशम् । स्वामित्रसादलामो हि वृत्तिलाभोऽनुजीविनाम् ॥१०॥ निदेश चितश्चास्मान् सम्भावयितुमर्हसि । बृत्तिलाभादपि प्रायः तल्लानः५ किडकरैर्मतः ॥१०१॥ मानवनिति ताक्यं स तानमरसत्तमान् । व्यसर्जयस्वात्कृत्य यथास्वं कृतमाननान ॥१०२॥ हिमवज्जयशंसीनि मङ्गलान्यस्य किराः । जगुस्तकुञ्जदेशेषु' स्वैरमारब्धमूर्च्छना ॥१०३॥ असकृत् किन्नरस्त्रीणाम् अाधुन्धानाः स्तनावृतीः । सरोवोचिभिदो नन्दम् आवतुरतद्वनानिलाः ॥१०४॥ स्थलादिमनीवनाद्विष्वक किरन् किञ्जल्कजं रजः । हिमी हिमाद्रिकुर्जेभ्यः तं सिषेवे समीरणः॥१०॥ स्थलाम्मोहिणीवास्य कीतिः साक' जयश्रिया। हिमाचलनिकुञ्जषु पप्रथे १५ दिग्जयाजिता ॥१०६॥ हिमाचलस्थलेष्वस्य धुतिरासीत् प्रपश्यतः । कृतोपहारकृत्येषु१२ स्थलाम्भोजैविकस्वरैः ॥१०७॥ तनुत्तत्तिमाकान्तनिकचक्रं विवृतायतिम् । स्वमिवानापरलद्धि हिमाद्रि बहवभंस्त। सः ॥१०॥ कर रहे हैं ॥९९।। इसलिये हे देव, हम लोगोंपर प्रसन्नतासे चञ्चल हुई दृष्टि डालिये क्योंकि स्वामीकी प्रसन्नता प्राप्त होना ही सेवक लोगोंकी आजीविका प्राप्त होना है। भावार्थ-स्वामी लोग सेवकोंपर प्रसन्न रहें यही उनकी उचित आजीविका है ॥१००॥ हे स्वामिन्, आप उचित आज्ञाओंके द्वारा हम लोगोंको सन्मानित करनेके योग्य हैं अर्थात् आप हम लोगोंको उचित आज्ञाएँ दीजिये क्योंकि सेवक लोग स्वामीकी आज्ञा मिलनेको आजीविका (तनख्वाह)की प्राप्तिसे भी कहीं बढ़कर मानते हैं ॥१०१॥ इस प्रकारके उस देवके वचनोंकी प्रशंसा करते हुए भरतने उन सब उत्तम देवोंका सत्कार किया और सवको अपने आधीन कर विदा कर दिया ॥१०२।। उस समय अपने इच्छानसार स्वरोंका चढ़ाव-उतार करनेवाले किन्नर देव उस पर्वतके लतागृहोंके प्रदेशों में भरतने हिमवान् देवको जीत लिया है' इस बातको सूचित करनेवाले मंगलगीत गा रहे थे ।।१०३।। उस समय वहां किन्नर देवोंकी स्त्रियोंके स्तन ढकनेवाले वस्त्रोंको बार-बार हिलाता हुआ तथा तालाबकी तरंगोंको छिन्न भिन्न करता हुआ उस हिमवान् पर्वतके वनोंका वायु धीरे धीरे बह रहा था ॥१०४।। स्थल कमलिनियोंके वनके चारों ओर केशरसे उतान्न हुआ रज फैलाता हुआ तथा हिमवान् पर्वतके लतागृहोंसे आया हुआ शीतल वायु महाराज भरतकी सेवा कर रहा था ।।१०५।। दिग्विजय करनेसे प्राप्त हुई भरतकी कोति जयलक्ष्मीके साथ साथ स्थलकमलिनियोंके समान हिमवान् पर्वतके लतागृहोंमें फैल रही थी ॥१०६॥ जिन्होंने फूले हुए स्थल-कमलोंसे उपहारका काम किया है ऐसे हिमवान् पर्वतके स्थलोंम चारों ओर देखते हुए भरतको बहुत ही संतोष होता था ।।१०७॥ वह हिमवान् पर्वत ठीक भरतके समान था क्योंकि जिस प्रकार भरत उच्चैर्वृत्ति अर्थात् उत्कृष्ट व्यवहार धारण करनेवाले थे उसी प्रकार वह पर्वत भी उच्चैर्वृत्ति अर्थात् बहुत ऊँचा था, जिस प्रकार भरतने अपने तेजसे समस्त दिशाएँ व्याप्त कर ली थी उसी प्रकार उस पर्वतने भी अपने विस्तार से समस्त दिशाएं व्याप्त कर ली थीं, जिस प्रकार भरत आयति अर्थात् उत्तम भवितव्यता (भविष्यत्काल) धारण करते थे उसी प्रकार वह पर्वत भी आयति अर्थात लम्बाई धारण कर रहा था और जिस प्रकार भरतके पास अनेक रत्नरूपी सम्पदाएँ थीं उसी प्रकार उस पर्वत के पास भी अनेक रत्नरूपी सम्पदाएँ थीं। इस प्रकार अपनी समानता रखनेवाले उस हिमवान् १कर। २ जीवितलाभ: । 'आजीवो जीविका वाती वृत्तिर्वतनजीवन' इत्यभिधानात् । ३ सेवनानाम् । ८ शासनः । 'अपवादस्तु निर्देशो निदेशः शासनं च सः । शिष्टिश्चाज्ञा चे इत्यभिधानात् । ५ आज्ञालाभ: । ६ पूजयन् । ७ तद्देवस्य वचनम् । ८ हिमवन्निकुञ्जप्रदेशेष । निकुञ्जकुजौ वा क्लीवे लतादिपिहितोदरे' इत्यभिधानात् । ६ उरोजाच्छादनवस्त्राणि । १० सह । 'साकं सत्रा समं राह' इत्यभिधानात्। ११ प्रागडोऽभवत् । १२ विहितपुष्पोपहारव्यापारेप। १३ धृतधनागमम् । १८ बहुमानगात् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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