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________________ 7. एयारहमए णरवर णिविट्ठ । बारहमए तिरिय णमन्त दिट्ठ । (1.8 प.च.) ---ग्यारहवें (कोठे) में श्रेष्ठ मनुष्य बैठे थे । बारहवें में नमन करती स्त्रियां देखी गईं। 8. माहव मासहो पढम-दिणे तहि सिरिकण्ठे दिण्णु पयाणउ । (6.5 प.च.) -वहां माधव मास के पहले दिन श्रीकण्ठ के द्वारा दान दिया गया । 9. देउलवाडउ पण्णु पहिल्लउ । (45.4 प.च.) -पहला देवकुल की बाड (और) ढाक का पेड़ था। 10. एहउ पहिलारउ मूल-सेण्णु । (16.12 प.च.) -यह (उसकी) पहली मूल-सेना है । 11. पहिलए कोट्टए रिसि-संधु दिछ । (1.8 प.च.) -पहले कोठे में ऋषि संघ देखा गया । 12. पहिल उ कलसु ल इउ अमरिन्दें। (2.5 प.च.) -पहले कलश देवेन्द्र के द्वारा लिया गया । 13. दसमउ कलसु लइज्जइ चन्दें । (2.5 प.च.) -दसवां कलश चन्द्र द्वारा लिया गया। 14. सत्तमे गम्पि जणणि जोक्कारिय । अट्ठमे दिवसे पुज्ज णीसारिय । (11.2 प. च.) -सातवें (दिन) जाकर जननी की स्तुति की गई। पाठवें दिन पूजा (यात्रा) निकाली गई। 15. ताव-चउहत्थउ पहरु समाहउ । (50.6 प.च.) -तब तक चौथा प्रहर समाप्त हुआ। प्रौढ अपभ्रंश रचना सौरभ ] [ 55 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002695
Book TitlePraudh Apbhramsa Rachna Saurabh Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani
PublisherApbhramsa Sahitya Academy
Publication Year1997
Total Pages202
LanguageApbhramsa, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Grammar
File Size5 MB
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