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________________ सरागसंयमसंयमासंयमबालतपश्चरणजितेंदियत्वनिः -कषायित्व-परीषहसहिष्णुत्वदृग्वतशीलाचरणजिनभक्तिपात्रदानपूजनतत्परतावैराग्यभावनाधर्मोपदेशपापनिवारण -ध्यानाध्ययनपरोपकारः धर्माचरणतत्परताविवेकत्वगुणानुराग निर्गुणमध्यस्थक्षमार्जवमार्दवादयो देवायुराअवस्य हेतवो विज्ञेयाः। __मनोवाक्कायवक्रताजिनेंद्रश्रुतमुनिधर्माधवर्णवादमिथ्यादर्शनपिशुनचलचित्तकूटसाक्षित्वपरनिंदात्मप्रशंसानृतपुरुषा असभ्यसरागवचनपरकोतूहलोत्पादनप्रगटकरण-परद्रव्यादान महारंमपरिग्रहत्वोज्वजलवेषमदमात्सर्यपरस्त्रीवशीकरणचैत्यपूजादानादिनिषेधनपरिविडंबनोपहास्यादिकरणदावाग्निप्रयोगप्रति सराग संयम, संयमासंयम, बालतप, जितेन्द्रियत्व, निष्कषाय, परिषहों को सहन करना, दिग्व्रत, शीलाचरण, जिन भक्ति, पात्र दान पूजन में तत्परता, वैराग्य भावना, धर्मोपदेश, पाप निवारण, ध्यान, अध्ययन, परोपकार, धर्माचरण में तत्परता, विवेक, गुणों में अनुराग, निर्गुणों के प्रति मध्यस्थ, क्षमा, आर्जव और मार्दव आदि देवायु के आश्रव के कारण जानना चाहिए। ' मन, वचन, काय की वक्रता, जिनेन्द्र देव, श्रुत, मुनि एवं धर्मादि का अवर्णवाद, मिथ्यादर्शन, पिशुनता, अस्थिरचित्त, झूठी गवाही, परनिंदा, आत्मप्रशंसा, झूठ, कठोर, असभ्य एवं राग युक्त वचन, दूसरों को कौतूहल उत्पन्न करने वाले कार्य करना,परद्रव्य हरण, बहुत आरंभ, बहुत परिग्रह, शौकीन वेष का घमण्ड, मात्सर्य, परस्त्री वशीकरण प्रयोग, चैत्य पूजा, दानादि का निषेध, दूसरों को परेशान करना, हंसी आदि उड़ाना, दावाग्नि जलवाना, प्रतिमा आयतन (93) Jain Education International For Private &Personal-Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002694
Book TitleKarma Vipak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVinod Jain, Anil Jain
PublisherNirgrantha Granthamala
Publication Year2004
Total Pages124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size5 MB
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