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________________ नौवाँ अधिकार/१३९ बाकी पांच रहे जे आन । ते सब दसौं दिसागत जान ।। दुबिध रास संसारी जीव । थावर जंगमरूप सदीव ||७५।। तहां पांच बिध थावरकाय । भू जल तेज वनस्पति बाय ।। चार जातके जंगम जंत । चलत फिरत दीखें बहुभंत ७६।। संख सीप कौड़ी कृमि जोक | इत्यादिक वेइंद्री-थोक || चैंटी दीम कुंथ पुनिआदि । ये तेइंद्री जीव अनादि ||७७|| माखी माछर भंगीदेह । भ्रमर प्रमुख चौइंद्री येह ।। देव नारकी नर विख्यात | केतक पसू पचेंद्री जात ||७८|| ये सब त्रस थावरके भेव । इनको विषयछेत्र सुन लेव ||७९।। छप्पय । फरस चारसै पांच, जीभ चौसठ सौ नासा । दृग जोजन उनतीस, सतक चौवन क्रम भासा ।। दुगुन असैनी अंत, श्रवन वसु सहस धनुष सुनि । सैनी सपरस विषै, कह्यौ नौ जोजन श्रीमुनि ॥ नौ रसन घ्राण नो चच्छुप्रति, सैंतालीस हजार गिन । दोसै त्रेसठि बारह स्रवनविषै-छेत्रपरवान भन ||८०|| चौपाई। एकेंद्री सूच्छम अरु थूल । तीनभेद विकलत्रय मूल || दोय प्रकार पचेंद्री कहे । मनसौं रहित सहित सरदहे ||८१।। दोहा । सातों ही परयाप्ततें, अपरयाप्ततें जान । चौदह जीवसमास यह, मूलभेद उर आन ||८२।। चौपाई। ऐसे ही चौदह गुनथान | चौदह मारगना उर आन ।। जब लग है इन रूपी राम | तबलौं संसारी यह नाम ||८३|| Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002686
Book TitleParshvapurana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhudhardas Kavi, Nathuram Premi
PublisherSanmati Trust Mumbai
Publication Year2001
Total Pages175
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size6 MB
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