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________________ २३८ ] आगम और त्रिपिटक : एक अनुशीलन [ खण्ड : २ उत्तर-पश्चिम के अतिरिक्त क्ष के लिए ख के प्रयोग की प्रवृत्ति प्रायः सभी शिलालेखों में प्राप्त होती है । कहीं-कहीं उत्तर-पश्चिम के शिलालेखों में भी क्ष के लिए ख प्राप्त होता है । उदाहरणार्थं, शाहबाजगढ़ी और मानसेा के दशम शिलालेख में क्षुद्रण के लिए खुद्रकेन' का प्रयोग हुआ है । उत्तर-पश्चिम के शिलालेखों में श के लिए प्रायः ञ का प्रयोग हुआ है । जैसे, रो तिकनं । अन्यान्य शिलालेखों में ञ् और नू; दोनों प्रकार के प्रयोग प्राप्त होते हैं । कहीं-कहीं उत्तर-पश्चिम के शिलालेखों में भी न् आया है, पर, बहुत कम । उत्तर-पश्चिम के शिलालेखों न्य के लिए भी प्रायः ञ का प्रयोग हुआ है । जैसे अजूनि अजे' इत्यादि । मानसेरा में क्वचित् य के लिए ग भी प्राप्त होता है । अन्यान्य अभिलेखों में प्रायः न्य के स्थान पर न प्राप्त होता है । गिरनार में भी मिलता है । १. डुकरं तु खो एवे खुद्रकेन वग्रन उसटेन व २. ४. ' ( दुष्करं तु खलु एतत् क्षुद्रकेण वर्गेण उशता ......... -शाहबाजगढ़ी, वशम शिलालेख ५. अयं प्रमदिपि देवन प्रिअस रओ लिखयितु । ( इयं धर्म लिपि: देवानां प्रियेण राज्ञा लेखिता ) ३. मित्र संस्तुततिकनं श्रमणब्रमणनं दनं प्रणनं अनरंमो । (.... मित्रसंस्तुतज्ञातिकानां श्रमणब्राह्मणानां दानं प्राणानामनार्लभ ) -शाहबाजगढ़ी, एकादश शिलालेख अनि च विनि रुपनि ब्रशयितुजनस । ................ - शाहबाजगढ़ी, प्रथम शिलालेख एषे अत्रे च बहुविधे धमचरणे वर्धिते । ( एतत् अन्यत् च बहुविधं धर्मचरणं वर्द्धितम् ।) - मानसेरा, चतुर्थ शिलालेख " अन्यानि च दिव्यानि रूपाणि दर्शयित्वा जनस्य । ) - शाहबाजगढ़ी, चतुर्थ शिलालेख ६. इमये धमनुश स्तिये यथं अणये पिक्रमने । ( अस्ये धर्मानुशिष्ट्यै यथा अन्यस्मै अपि कर्मणे । ) -- मानसेरा, तृतीय शिलालेख Jain Education International 2010_05 3 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002622
Book TitleAgam aur Tripitak Ek Anushilan Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNagrajmuni
PublisherArhat Prakashan
Publication Year1982
Total Pages740
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Literature
File Size14 MB
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