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________________ १४) मध्यम परिणाम अर्थात् विषय कषाय की मंदता हो । १५) प्रकृति से भद्रता-भद्र मिथ्यात्वी । १६) मीट्टी की रेखा के समान क्रोधादि हो अर्थात् सरल लोक व्यवहार हो । १७) हिंसा तथा दुष्ट कार्यों से विरक्ति हो । १८) ईर्ष्या रहित परिणाम-संतोष वृत्ति हो । १९) अंत समय में (मरते समय)धर्मध्यानादि के परिणाम ४१वाला । जिस में साधारण गुण हो, प्रकृति से कम कषाय हो और जिसको दानादि में आनंद आता हो, ऐसा सरल स्वभावी प्राणी मनुष्यायु बांधता है ।४२ ४) देव :- देवगति के बंध के कारण १) हिंसा, असत्य चोरी आदि महान दोषों से विरतिरूप संयम अंगीकार कर लेने के बाद भी कषायों के कुछ अंश का शेष रहना-सरागसंयमी होना । २) हिंसाविरति आदि व्रतों का अल्पांश में धारण करना, संयमासंयम है। ३) पराधीनता के कारण या अनुसरण के लिए अहितकर प्रवृत्ति अथवा आहार आदि का त्याग अकाम निर्जरा है । ४) बालभाव से अर्थात् बिना विवेक के अग्निप्रवेश, जलप्रवेश, पर्वतप्रपात, विषभक्षण, अनशन आदि देहदमन की क्रियाएँ करना आदि बालतप से । ५) रागयुक्त संयम व्रत के पालन से । ६) देशविरति धर्म रूप श्रावक धर्म के पालन से । ७) निर्जरा की बुद्धि रहित कर्म का क्षय करने से । ८) मिथ्यादृष्टि से बालतप करने से । ९) कल्याण मित्र का संपर्क रखने से-वंकचूल की तरह । १०) जिनवाणी रूप धर्म का श्रवण करने से ।। ११) दान, शील, तप और भावरूप चतुर्विध धर्म करने से । १२) शुभ लेश्या के परिणामों से । १३) अविरति सम्यग्दर्शन के प्रभाव से । Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002570
Book TitleJain Agamo me Swarg Narak ki Vibhavana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHemrekhashreeji
PublisherVichakshan Prakashan Trust
Publication Year2005
Total Pages324
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & agam_related_other_literature
File Size17 MB
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