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________________ २३६ छोड़ना। ऐसे विविध रूप से वे नारकों को दुःख देते हैं । अब उन परमाधामी देवों के नाम और कार्य देखेंगे । नरकावासों के देव और उनके कार्यप्रथम तीन नारक-रत्नप्रभा, शर्करांप्रभा और बालुकाप्रभा में परमाधार्मिक देव नैरयिकों को वेदना देते है । ये देव १५ प्रकार के होते हैं, उनके कार्यानुरूप नाम हैं । वे नाम निम्न प्रकार हैं१) अंब __ अपने निवास स्थान से ये देव आकर अपने मनोरंजन के लिए नारकीय जीवों को इधर-उधर दौड़ाते हैं, पीटते हैं, उनको ऊपर उछालकर शूलों में पिरोते हैं । उन्हें पृथ्वी पर पटक-पटक कर फेंक देते हैं। उन्हें पुनः अंबर-आकाश में उछालते हैं । फेंकते हैं। २) अंबरिणी मुद्गरों से आहत, खड्ग आदि से उपहत, मूच्छित उन नारकियों को ये देव करवत आदि से चीरते हैं, उनके छोटे-छोटे टुकडे करते हैं । ३) श्याम ये देव जीवों का अंगच्छेद करते हैं, उनको पर्वतों से नीचे गिराते हैं, उनके नाक को बींधते हैं, उन्हें रज्जु से बांधते हैं । ४) शबल ये देव नारकिय जीवों की आंते बाहर निकाल लेते हैं, हृदय का नाश कर देते हैं। कलेजे का मांस निकाल लेते है, चमड़ी उधेड़ कर उन्हें कष्ट देते हैं । ५) रौद्र ये अत्यंत क्रूरता से नारकीय जीवों को दुःख देता हैं । ६) उपरौद्र ये देव नारकों के अंग-भंग करते हैं, हाथ-पैरों को मरोड़ देते हैं । ऐसा एक भी क्रूरकर्म नहीं, जो ये न करते हो । Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002570
Book TitleJain Agamo me Swarg Narak ki Vibhavana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHemrekhashreeji
PublisherVichakshan Prakashan Trust
Publication Year2005
Total Pages324
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & agam_related_other_literature
File Size17 MB
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