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________________ १६७ है । इसमें कमल बिस (कमलकंद) शतपत्र आदि सुंगधित पुष्पो से सुशोभित हैं । उसमें पराग कण के लिए भ्रमर के समूह गुंजन करते रहते हैं । अनेक पशुपक्षी के समूहों के गमनागमन से सदा व्याप्त रहती है । सभी जलाशय एक-एक पद्मवरवेदिका और एक-एक वनखंड से घिरे इन जलाशयों में से किसी-किसी में, आसव, वारूणोदक (वारूण समुद्र के जल) क्षीरोदक, घी इक्षुरस और किसी में प्राकृतिक स्वाभाविक पानी जैसा पानी भरा है । प्रत्येक वापिकाओं यावत् कूपपंक्तियों की चारो दिशाओं में तीन-तीन सुंदर सोपान तोरणो, ध्वजाओं और छत्रातिछत्रों की तरह वर्णन समझना । इन छोटीछोटी वापिकाओं और कूपपंक्तियों के मध्यवर्ती प्रदेशो में बहुत से उत्पात पर्वत, नियतिपर्वत, जगतीपर्वत, दारूपर्वत तथा कितने ही ऊँचे-नीचे, छोटे-बडे दकमंडप, दकमंच, दकमालक, दकप्रासाद बने हुए हैं। ये सभी पवर्त सर्वरत्नमय रूप से शोभायमान हैं । वापिकाओं आदि के अन्तरालवर्ती स्थानों में आये हुए पर्वतों का वर्णन निम्न प्रकार से १) उत्पात पर्वत :- ऐसे पर्वत जहाँ सूर्याभ-विमानवासी देव-देवियाँ विविध प्रकार की चित्र-विचित्र क्रीडाओं के निमित्त अपने-अपने उत्तर वैक्रिय शरीरों की रचना करते हैं। २) नियतिपर्वत :- इन पर्वतों पर सूर्याभ-विमानवासी देव-देवियाँ अपनेअपने भवधारणीय (मूल) वैक्रिय शरीरों से क्रीडारत रहते हैं । ३) जगतीपर्वत :- इन पर्वतों का आकार कोट-परकोट जैसा होता है । ४) दारूपर्वत :- दारू अर्थात् काष्ठ-लकडी । लकड़ी से बने पर्वत जैसे आकार वाले कृत्रिम पर्वत ।। ५) दकमंडप :- स्फटिक मणियों से निर्मित मंडप अथवा ऐसे मंडप जिनमें फुव्वारों द्वारा कृत्रिम वर्षा की रिमझिम-रिमझिम फुहारें बरसती रहती हैं । ६) दकमालक :- स्फटिक मणियों से बने हुए घर के ऊपरी भाग में हुए कमरे-मालिये ।१७० Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002570
Book TitleJain Agamo me Swarg Narak ki Vibhavana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHemrekhashreeji
PublisherVichakshan Prakashan Trust
Publication Year2005
Total Pages324
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & agam_related_other_literature
File Size17 MB
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