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________________ १२९ हुए दोनों अति सुंदर दिखते हैं। इस प्रकार कल्पोपपन्न वैमानिक देवों के बारह कल्पों के नाम व उनके इंद्रों के नाम उल्लेख प्राप्त हुआ । १ कल्पातीत वैमानिक देव ग्रैवेयक'३१ :- बारह कल्प पूर्ण होने पर ग्रेवैयक आते हैं । कल्प का व्यवहार न होने से ये कल्पातीत कहे जाते हैं । ये चौदह राज्यलोक के पुरुषाकार के ग्रीवा यानि कंठ स्थान पर रहते हैं। इनके नौ प्रतर को ग्रैवेयक कहते हैं । ये विमान लोकपुरुष के ग्रीवा-मस्तक के आभूषण के रूप जैसे होने से भी इनको ग्रैवेयक कहा जाता है । ये नौ संपूर्ण चंद्राकार रत्न जैसे तेजस्वी दिखते हैं । इनके नाम व प्रतरों के स्थानों का उल्लेख भेदों के साथ दिया जा चुका है। अनुत्तर :- विजय, वैजयन्त, जयन्त - मोक्ष मार्ग के बीच आनेवाले सभी विघ्नों पर जिन्होंने विजय प्राप्त करली है, उससे उनको विजय-वैजयन्त और जयन्त ऐसे भिन्न-भिन्न तीन नामों से पहचाना जाता है । ये तीनों अलग-अलग अनुत्तर विमान हैं। अपराजित :- मोक्ष मार्ग में आने वाले विघ्नों से जो पराजित नहीं हो सके ऐसे उस विमान एवं उनके स्वामी को अपराजित कहा जाता है । सर्वार्थसिद्ध :- सभी प्रकार से उन्नति प्राप्त कर ली हो, सर्व पारमार्थिक स्वार्थों को पा लिये हो, संपूर्ण अभ्युदयरूप प्रयोजनों के विषय में जो सिद्ध हो चुके हैं, उनको सर्वार्थसिद्ध कहते हैं । इनके विमान को भी सर्वार्थसिद्ध विमान कहा जाता है । इन पाँचों को अनुत्तर कहने का कारण यह है कि१) ये अल्प संसारी होने से उत्तम प्रधान है । २) कल्प के अंत में आये हैं, उसके बाद कोई विमान नहीं है इसलिए भी अनुत्तर हैं । ___ इस प्रकार सभी देवों का संक्षिप्त परिचय और विमानों को आकार के वर्णन यहाँ किया गया है । ५. सामान्य वैमानिक देवों का स्वरूप निरूपण : वैमानिक देवों का वर्ण कमल के पत्र के समान गौर, श्वेत और सुखद होता है। ये शुभ गन्ध, रस, और स्पर्श वाले होते हैं । ये उत्तम विक्रिया Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002570
Book TitleJain Agamo me Swarg Narak ki Vibhavana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHemrekhashreeji
PublisherVichakshan Prakashan Trust
Publication Year2005
Total Pages324
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & agam_related_other_literature
File Size17 MB
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