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________________ १९४ ध्यानशतकम् इंद्रिय सुखकुं तेथि नहि कांई मना हो लाल. नहि को० देवलोक द्विकतांइ अच्छे देवांगना हो लाल; अछे दे० अच्युत लगी सुर नारि जाय छे दुख विना हो लाल । दुख० ८ उपर नहीं विकार इंद्रिय पिण को नही रे लाल, इंद्रि० ग्रेवेका लगि चालि मिथ्यात्वीनी कही हो लाल; मिथ्या० पंचानुत्तर देव सहित समकित अच्छे हो लाल, सहि० सर्वारथसिद्ध देव एक भवभय छे हो लाल. एक० ९ चौगतिमे सुख दुख लह्यो में बहु परे हो लाल, लह्यो० खिणमे रच्या मुझ गरज न विकासे रे हो लाल; गरज० ध्यावो निश्चल देव सरंव जगजाण हो लाल, सरव० भमियो चवदह राज तोहि शिवठाण ए हो लाल । तोहि० १० तिन भुवननो जाण त्रिविध गुण रवि ए हो लाल, त्रिविध० चोथो धर्म सुध्यान लोकथिति ध्यावे ए हो लाल; लोक०। परमातम आदेय सदा थें आदरो हो लाल, सदा० अक्षर त्रयगुणयुक्त देवमुनि मन धरो हो लाल. देव० ११ [दुहा] हवे पिंडस्थ पदस्थ वलि,रूपी रुपातीत; ओर ध्यानविधि च्यार ए, ध्यावो धरि प्रतीत । १ तिहां पिंडस्थध्यानथी, पिण धारणा अनूप; पार्थिव आग्नेयी पवन, वरुण तत्त्व स्वरूप । २ मुनि तत तीन छे लोकसम, जलधि जेम आकाश; जंबूद्वीप सहस्रदल, मेरुसिंधासन भास । ३ तिहां बेठो यो सवर, ध्यावे आतमध्यान; मन भमे ने वशी करे, सो पार्थिवगुण मान । ४ थिर अभ्यासे नाभिमे, कमल सोल दल सार; पत्रे सूरगण चिंतवे, अहँ मध्य उदार । ५ तिण. अर्हथी अग्निगण, हदय अष्टदल देह; ऊंचे मुखे अडकर्मने, दहे बल ध्यान तेह । ६ वह्नि बीज समकीतसहीत, मंडले अग्नित्रिकोण; धूमरहित कलधौतयुति, दहे कर्म भगौण । ७ दही कर्म ले शांतता, तृण विणु अग्नि समान; धरे शुद्ध निज धारणा, ए आग्नेयी मान । ८ [ढाल-६ - राग - कूमरी बुलावे कूबडो. एहनी] ध्यान पिंडस्थ विचारीये, शुद्धातम गुणधामो रे; आतमशक्तिस्वभाव ए, लोकालोकनी सामो रे । ध्यान० १ Jain Education International 2010_02 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002560
Book TitleDhyanashatakam Part 2
Original Sutra AuthorJinbhadragani Kshamashraman, Haribhadrasuri
AuthorKirtiyashsuri
PublisherSanmarg Prakashan
Publication Year2009
Total Pages350
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size19 MB
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