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________________ ध्यानशतक और धवला का ध्यानप्रकरण tatatatatatašašaèáèáèäèâzáž Pazara वहां एक गाथा ऐसी है जो क्रम से ध्यानशतक की ५८वीं और ५७वीं गाथाओं के उत्तराधों के योग से निष्पन्न हुई है' । तदनन्तर इसी प्रसंग में वहां ध्यानशतक की ६२, ६५, ३- ४, ६६-६८, ९३ और १०२ ये गाथायें क्रम से उद्धृत की गई है । अन्त में धवला में जो शुक्लध्यान की प्ररूपणा की गई है वह प्रायः तत्त्वार्थसूत्र और ध्यानशतक के ही समान है । इस प्रसंग में यहां ध्यानशतक की ६९, १०१, १००, ९० ९२, १०३, १०४ (पू.) ७५ और ७१-७२ ये गाथायें क्रम से उद्धृत की गई है । साथ ही वहां भगवती आराधना की भी १८८०-८८ गाथायें उद्घृत की गई है' । दोनों में कुछ पाठभेद इस प्रकार घवला (पुस्तक १३ ) में जो ध्यानशतक की लगभग ४६-४७ गाथायें उद्धृत की गई हैं उनमें ऐसे कुछ पाठभेद भी हैं, जिनके कारण वहां कुछ गाथाओं का अनुवाद भी असंगत हो गया है । यहां हम 'होइ - होज्ज, भूदोव-भूओव, ट्ठियो- ठिओ, लाहं - लाभं' ऐसे कुछ पाठभेदों को छोडकर अन्य जो महत्त्वपूर्ण पाठभेद उक्त दोनों ग्रन्थों में रहे हैं, और जिनके कारण अर्थभेद होना भी सम्भव है, उनकी एक तालिका दे रहे हैं । सम्भव है उससे पाठकों को कुछ लाभ हो सके । इसके अतिरिक्त भविष्य में यदि धवला पु. १३ के द्वितीय संस्करण की आश्यकता हुई तो उसमें तदनुसार कुछ संशोधन भी किया जा सकता है । १. धवला में उसकी क्रमिकसंख्या ४८ (पृ. ७३ ) है । २. धवला में उनकी क्रमिकसंख्या ४९, ५०, ५१-५२, ५३-५५, ५६, ५७, (पृ. ७६-७७) है । ३. धवला पु. १३, पृ. ७७-८८ । ४. धवला में उनकी क्रमिकसंख्या इस प्रकार है-६४, ६५, ६६, ६७-६९, ७०, ७१, ७४, ७५-७६ । १११ ५. धवला में उनकी क्रमिकसंख्या इस प्रकार है -५८-६३, ७२-७४ । ६. जैसे- पृ. ६७, गा. २१ व २२; पृ. ६८, गा. २४ व २७, पृ. ७१ गा. ३५-३७ । पृ. ७३, गा. ४८ का पाठभेद सम्भवतः प्रतिलेखक की असावधानी से हुआ है-ध्यानशतक की गा. ५८ और ५७ के क्रमशः उत्तराध के मेल से यह गाथा बनी है । इस अवस्था में वह प्रकरण से सर्वथा असम्बद्ध हो गई है । ध्यानशतक के अन्तर्गत गा. ५६-५७ में संसार - समुद्र का स्वरूप दिखलाया गया है तथा आगे वहां गा. ५८-५९ में उक्त संसार-समुद्र से पार करा देनेवाली नौका का स्वरूप प्रगट किया गया है । वहां गा. ५८ के उत्तरार्ध में उपयुक्त 'णाणमयकण्णधारं (ज्ञानरूप कर्णधार से संचालित)', यह विशेषण वहां चारित्ररूप महती नौका का रहा है, वह धवला में हुए इस पाठभेद के कारण संसार-समुद्र का विशेषण बन गया है। यह एक वहां सोचनीय असंगति हो गई है । Jain Education International 2010_02 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002559
Book TitleDhyanashatakam Part 1
Original Sutra AuthorJinbhadragani Kshamashraman, Haribhadrasuri
AuthorKirtiyashsuri
PublisherSanmarg Prakashan
Publication Year2009
Total Pages302
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size18 MB
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