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________________ यह तीर्थंकर नामकर्म की उत्कृष्ट पुण्यप्रकृति का उदय है । जो पूर्व में उपार्जित किया हुआ था । यह सर्वोत्कृष्ट पुण्यप्रकृति है । तीर्थंकर भगवान का जीव ही उपार्जित करता है । और जो यह पुण्यप्रकृति पहले उपार्जित करता है वही जीव उसके उदय काल में तीर्थंकरत्व का वैभव प्राप्त कर सकता है । सर्वसामान्य सभी जीव तीर्थंकर नामकर्म नहीं बांधते हैं । इसकी भी एक अनोखी - अद्भुत प्रक्रिया है । तीर्थंकर नामकर्म बांधने की प्रक्रिया तीर्थंकर शब्द भगवान, परमात्मा अर्थ में यहाँ प्रयुक्त है । जगत् के सभी धर्मों में भगवान ईश्वर को माना गया है । उनका स्वरूप कैसा किस प्रकार का मानना यह सबका अपना-अपना तरीका है। लेकिन एक मात्र जैन धर्म के सिवाय अन्य किसी भी धर्म ने भगवान बनने की कोई प्रक्रिया - पद्धति नहीं बताई, कि ऐसा ऐसा करने से भगवान बना जाता है, यह बात ही नहीं बताई । क्यों कि उन सब धर्मों की मान्यता ऐसी है कि .. भगवान बना ही नहीं जाता है । यह तो एक का ही अधिकार है । बस, वही विभु परम ब्रह्म ही पुनः दूसरे - दूसरे रूप धारण कर जन्म लेते हैं । अवतारवाद की प्रक्रिया माननेवाले वे सभी धर्म ऐसा मानते हैं कि सर्वशक्तिमान् जगत्कर्ता ईश्वर... धर्म की ग्लानि और अधर्म का अभ्युत्थान देखकर उसका नाश एवं अपनी प्रजा का रक्षण करने के लिए बार बार आकर अवतार लेते हैं, जन्म धारण करते हैं । वे भी बार-बार आकर कभी राम, कभी कृष्ण, कभी शंकर आदि बनते हैं । इस तरह २४ अवतार माने हैं । ख्रिस्ती तथा इस्लाम धर्म भी अवतारवाद Incarnation Theory को ही स्वीकार करते हैं । एकमात्र जैन धर्म अवतारवाद की पद्धति को बिल्कुल ही नहीं मानता है । जैन धर्म का स्पष्ट मत है कि- " अप्पा सो परमप्पा” आत्मा ही परमात्मा है । संसार में अनन्त भव्यात्माएँ हैं । इनमें से कोई आत्मा ... आगे बढकर तीर्थंकर नाम कर्म उपार्जित करके . गुणस्थानों के सोपानों पर चढती हुई १३ वे गुणस्थान पर आकर तीर्थंकर भगवान बन ... I सकती है । प्रत्येक आत्मा भिन्न भिन्न स्वतंत्र ही होती है। ऐसा नहीं होता है कि... एक ही आत्मा मोक्ष में जाकर सिद्ध बनकर पुनः संसार में आए और पुनः तीर्थंकर बने । जी नहीं । जैन धर्म ऐसा नहीं स्वीकारता है । स्पष्ट कहना है कि एक आत्मा जो आदिनाथ बनकर मोक्ष में गई उसके बाद दूसरी ही कोई आत्मा अजितनाथ नामक भगवान बनी । वे दूसरे भगवान हुए। उसके बाद तीसरी स्वतंत्र कोई आत्मा संभवनाथ भगवान बनी । आत्मिक विकास का अन्त आत्मा से परमात्मा बनना १२३५
SR No.002484
Book TitleAadhyatmik Vikas Yatra Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorArunvijay
PublisherVasupujyaswami Jain SMP Sangh
Publication Year2010
Total Pages534
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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