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________________ ॥७४॥ कहाँ है ? और इसमें कोई शारीरिक थकान तो होती ही नहीं है, फिर सवाल ही कहाँ है? · . यहाँ तो मात्र ध्यान ही करना है । और कौन सा ध्यान ? शुक्लध्यान । अब ध्यान का स्तर नीचा थोडे ही गिर सकता है ? शुक्ल ध्यान ही सब ध्यानों में सर्वोच्च कक्षा का श्रेष्ठ ध्यान है। इसमें प्रथम भेद से द्वितीय भेद और द्वितीय से तृतीय इस तरह क्रमशः उत्तरोत्तर चढते हुए ऊँचे श्रेष्ठतर-सर्वश्रेष्ठ कक्षा के ध्यान भेद हैं। इन ४ भेदों में भी प्रथम के २ भेद के शुक्ल ध्यान की साधना... छद्मस्थ अवस्था में होती है । और शेष २ ध्यान सर्वज्ञता प्राप्त करने के बाद १३ वे गुणस्थान पर होते हैं। इसलिए ध्यानी के इस ध्यान में जितनी तीव्रता-प्रबलता रहेगी उतना ही आगे चढना बहुत जल्दी होता है । इसलिए शुक्लध्यान साधना में क्या करना, कैसे करना, यह ग्रन्थकार महर्षी स्वयं फरमाते हैं। १२ वे गुणस्थान पर शुक्लध्यान भूत्वाऽथ क्षीणमोहात्मा, वीतरागो महायतिः। पूर्ववद्भावसंयुक्तो, द्वितीयं शुक्लमाश्रयेत् अपृथक्त्वमवीचारं, सवितर्कगुणान्वितम्। सध्यायत्येकयोगेन, शुक्लध्यानं द्वितीयकम् ॥७५॥ क्षपकश्रेणी पर आरूढ महात्मा १२ वे गुणस्थान पर आकर क्षीणमोही बनकर... वीतरागी बनकर... महान् यति (साधु) महात्मा जैसे कि पहले कर्मों का जडमूल से क्षय करने की जो प्रवृत्ति क्षपक श्रेणी के गुणस्थान पर कर रहा था वही भाव, वैसे ही ऊँचे सर्वोत्तम भाव बनाए रखे, क्यों कि...अभी भी आगे और कई कर्मों का सफाया करना ही है । अतः भाव तूट जाय या कम भी हो जाय तो कैसे चलेगा? इसी पर तो सारा आधार है। प्रबल श्रेष्ठतर चढते हुए भाव ही साधक को अग्रसर करने में ऊँचा सहायक होता है। कर्मक्षय करने का आत्मा के लिए विशुद्धतर अध्यवसाय का होना अत्यन्त आवश्यक है। अब इसको साथ–सहारा मिल जाय शुक्लध्यान का। । शुक्ल ध्यान के ४ प्रकारों में से पहले चरण का ध्यान तो वीतरागता की प्राप्ति के पहले ही हो गया। अब दूसरे प्रकार का शुक्ल ध्यान वीतरागता की प्राप्ति के पश्चात् ही होगा। इससे यह स्पष्ट हो गया कि शुक्ल ध्यान के दूसरे चरण का अधिकारी ध्याता वीतरागी ही हो सकता है। और तीसरे-चौथे भेद का शुक्ल ध्यान सर्वज्ञ बनकर १३ वे गुणस्थानवाला ही कर सकता है। इस तरह शुक्लध्यान के ४ चरण की ध्यान साधना ३ विभागों में होती है। १२०४ आध्यात्मिक विकास यात्रा
SR No.002484
Book TitleAadhyatmik Vikas Yatra Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorArunvijay
PublisherVasupujyaswami Jain SMP Sangh
Publication Year2010
Total Pages534
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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