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________________ चतुर्थ अध्ययन : अब्रह्मचर्य-आश्रव ४३५ (८) अहिन्निका की कथा अप्रसिद्ध होने से उस पर प्रकाश डालना अशक्य है । कई लोग 'अहिन्नियाए' पद के बदले 'अहिल्लियाए' मानते हैं। उसका अर्थ होता है-अहिल्या के लिए हुआ संग्राम ।" अगर यह अर्थ हो तब तो वैष्णव रामायण में उक्त 'अहिल्या' की कथा इस प्रकार है—अहिल्या गौतमऋषि की पत्नी थी। वह बड़ी सुन्दर और धर्मपरायणा स्त्री थी। एक बार इन्द्र उसका रूप देखकर मोहित हो गया। एक दिन गौतम ऋषि कहीं बाहर गये हुए थे। इन्द्र ने उचित अवसर जान कर गौतम ऋषि का रूप बनाया और छलपूर्वक अहिल्या के पास पहुंच कर संयोग की इच्छा प्रगट की। निर्दोष अहिल्या ने अपना पति जान कर कोई आनाकानी न की। इन्द्र अनाचार सेवन करके चला गया। जब गौतम ऋषि आए तो उन्हें इस बात का पता चला और उन्होंने इन्द्र को शाप दे दिया कि 'तेरे एक हजार भग हो जॉय ।' वैसा ही हुआ । बाद में, इन्द्र के बहुत स्तुति करने पर ऋषि ने उन भगों के स्थान में एक हजार नेत्र बना दिये । परन्तु अहिल्या पत्थर की तरह निश्चेष्ट होकर तपस्या में लीन हो गई । वह एक ही जगह गुमसुम हो कर पड़ी रहती। एक बार श्रीराम विचरण करते-करते आश्रम के पास से गुजरे तो उनके चरणों का स्पर्श होते ही वह जागृत होकर उठ खड़ी हुई। ऋषि ने भी प्रसन्न होकर उसे पुनः अपना लिया। (६) सुवर्णगुटिका के लिए हुआ संग्राम-सिन्धु–सौवीर देश में वीतभय नामक एक पत्तन था । वहाँ उदयन राजा राज्य करता था। उसकी महारानी का नाम पद्मावती था । उसकी देवदत्ता नामक एक दासी थी । एक बार देश-देशान्तर में भ्रमण करता हुआ एक परदेशी यात्री उस नगर में आ गया। राजा ने उसे मन्दिर के निकट धर्मस्थान में ठहराया । कर्मयोग से वह वहाँ रोगग्रस्त हो गया । रुग्णावस्था में इस दासी ने उसकी बहुत सेवा की । फलतः आगन्तुक ने प्रसन्न होकर इस दासी को सर्वकामना पूर्ण करने वाली १०० गोलियाँ दे दी और उनकी महत्ता एवं प्रयोग करने की विधि भी बतला दी । अव्वल तो स्त्री जाति. फिर दासी। भला दासी को उन गोलियों का सदुपयोग करने की बात कैसे सूझती ? उस बदसूरत दासी ने सोचा"क्यों नही, मैं एक गोली खा कर सुन्दर बन जाऊँ !" उसने अजमाने के लिए एक गोली मुंह में डाल ली। गोली के प्रभाव से वह दासी सोने के समान रूप वालीखूबसूरत बन गई । तब से उसका नाम सुवर्णगुटिका ही प्रसिद्ध हो गया । वह नवयुवती तो थी ही । एक दिन बैठे-बैठे उसके मन में विचार आया-"मुझे सुन्दर रूप तो मिला; लेकिन बिना पति के सुन्दर रूप भी किस काम का ? पर किसे पति बनाऊँ ? राजा को तो बनाना ठीक नही, क्योंकि एक तो यह बूढ़ा है, दूसरे, यह मेरे लिए पितातुल्य है। अतः किसी नवयुवक को ही पति बनाना चाहिए।” सोचते-सोचते उसकी दृष्टि में उज्जयिनी का राजा चन्द्रप्रद्योत अँचा । फिर क्या था ? उसने मन
SR No.002476
Book TitlePrashna Vyakaran Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni
PublisherSanmati Gyanpith
Publication Year1973
Total Pages940
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_prashnavyakaran
File Size21 MB
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