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________________ तृतीय अध्ययन : अदत्तादान -आश्रव २४१ लोलिक्क – पराई मनपसंद वस्तु देख कर उसे किसी भी उपाय से लेने के लिए मन का चलायमान होना 'लौल्य' कहलाता है । यह लोलुपता की चंचलवृत्ति ही चोरी को उत्तेजन देती है । इसलिए लौल्य को अदत्तादान का जनक कहना उचित ही है । तक्करत्तणंति य-- जब मनुष्य चोरी करने में अभ्यस्त हो जाता है तो वह प्राणों के खतरे की भी परवाह न करके डाका डालने लगता है, साहस करके दूसरों के मकान पर छापा मारता है, अथवा राज्यदण्ड की परवाह न करके चुंगी बचाने के लोभ में तस्करव्यापार ( स्मगलिंग) करता है । ऐसी तस्करता अदत्तादान की बहन नहीं तो क्या ? इसलिए तस्करत्व को अदत्तादान का पर्यायवाची ठीक ही बताया है । या अवहारो - किसी भी सजीव या निर्जीव वस्तु का छिप कर, जबर्दस्ती, धोखा देकर अथवा किसी की गफलत से लाभ उठा कर अपहरण कर लेना अपहार है, और वह भी एक प्रकार का अदत्तादान होने से उसे अदत्तादान का पर्यायवाची कहना यथार्थ है । हत्थलहुत्तणं — कई लोग किसी की जेब, अलमारी, संदूक या कैसबक्स में पड़े हुए धन को ऐसी सिफ्त से चुराते हैं कि उसके मालिक को पता ही नहीं लग पाता । यह हस्तलाघव या हाथ की सफाई वास्तव में अदत्तादान का ही प्रकार है, इसलिए इसे अदत्तादान का पर्यायवाची कहना उचित है । - पावकम्मकरणं – चोरी करने वाले व्यक्ति में हिंसा, असत्य, परिग्रह, क्रूरता, निर्दयता, माया, लोभ, क्रोध आदि पापकर्म स्वाभाविक ही पाये जाते हैं । इसलिए अदत्तादान अनेक पापकर्म का कारण होने से इसे 'पापकर्मकरण' कहना यथार्थ है । तेणिक्कं — चोरों का मुख्य कार्य चोरी करना है । वे झूठ बोलते हैं, छल करते हैं, हत्या, मारपीट आदि करते हैं और इन सबको करते हैं चोरी के लिए ही । इसलिए अदत्तादान को चोरों का काम ( स्तेय) बताना उचित ही है । हरणविप्पणासो – किसी की चीज उड़ा कर भाग जाना हरणविप्रणाश है, अथवा किसी की चीज को हरण कर उसे नष्ट-भ्रष्ट कर देने को भी हरणविप्रणाश कहते हैं । यह भी अदत्तादान का साथी होने से उसका पर्यायवाची शब्द ठीक ही है । आदियणा – दूसरों का धन या पदार्थ मांग कर ले लेना, किन्तु उसे वापिस न लौटाना या लौटाने से इन्कार कर देना भी, आदान नामक अपराध है, जो चोरी कोटि में ही है । १६
SR No.002476
Book TitlePrashna Vyakaran Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni
PublisherSanmati Gyanpith
Publication Year1973
Total Pages940
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_prashnavyakaran
File Size21 MB
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