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________________ तीर्थंकर : एक अनुशीलन 8 125 लोगहियाणं - लोकहितकर्ता। सवि जीव करूँ शासन रसी, ऐसी हितकारी भावना के उपदेश तथा प्रवृत्ति से तीर्थंकर ही समस्त लोक के हितकर्ता हैं। लोगपईवाणं - लोकप्रदीप। अज्ञानांधकार का नाश करने वाले तीर्थंकर लोक में दीपक के समान हैं। ___ लोगपज्जोयगराणं - लोकप्रकाशक। कल्याणकों पर द्रव्य उद्योत हो एवं केवलज्ञान प्राप्त कर ज्ञान का प्रकाश किया हो, ऐसे तीर्थंकर परमात्मा ही सर्वप्रकाशक सच्चे सूर्य हैं। अभयदयाणं - अभयदाता। जगत् के समस्त प्राणियों को 7 प्रकार के भय से मुक्त करने वाले तीर्थंकर अभयदान के दाता हैं। ___ चक्खुदयाणं - चक्षुदाता। ज्ञानावरणीय कर्मरूप पट्टी का अनावरण करने वाले तीर्थंकर श्रुतज्ञानरूप चक्षु के दाता है। मग्गदयाणं - मार्गदाता। संसाररूपी अटवी में रागद्वेषरूपी चोरों से बचाकर रत्नत्रयरूप, मोक्षमार्ग के प्रदर्शक तीर्थंकर होते हैं। सरणदयाणं - शरणदाता। चारों गतियों के दुःखों से मुक्ति पाने वाले प्राणियों को तीर्थंकर ज्ञानरूप सुभट की शरण देते हैं। बोहिदयाणं - बोधिदाता, अनादिकाल से मिथ्यात्व रोग से पीड़ित भव्यों को सम्यक्त्व रूप औषधि देने वाले तीर्थंकर बोधिदाता हैं। धम्मदयाणं - धर्मदाता। पतित होते हुए व्यक्ति की आत्मा को देशविरति व सर्वविरति रूप धर्म से उत्थान करने वाले तीर्थंकर धर्मप्रदाता हैं। ___धम्मदेसयाणं - धर्मोपदेशक। स्याद्वादमय निरुपम एवं यथातथ्य धर्म के स्वरूप का उपदेश तीर्थंकर देते हैं। धम्मनायगाणं - धर्मनायक। चतुर्विध संघ के संस्थापक, प्रवर्तक व रक्षक होने से तीर्थंकर धर्मनायक हैं। ' धम्मसारहीणं - धर्मसारथी। धर्मरूपी रथ पर आरूढ़ होकर चारों तीथों को निर्विघ्न मोक्ष पहुँचाने वाले तीर्थंकर धर्मरथ के सारथी हैं। धम्मवरचाउरंत - चक्कवट्टीणं धर्मचक्रवर्ती। चार गति का अंत करने वाले तीर्थंकर धर्मचक्र के धारक होने से धर्मचक्रवर्ती हैं। शास्त्र का सामान्य अध्ययन भी सच्चरित्र साधक के लिए प्रकाशदायक होता है। जिसके चक्षु खुले हैं, उसे एक दीपक भी अपेक्षित प्रकाश दे देता है। - आवश्यकनियुक्ति (99)
SR No.002463
Book TitleTirthankar Ek Anushilan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPurnapragnashreeji, Himanshu Jain
PublisherPurnapragnashreeji, Himanshu Jain
Publication Year2016
Total Pages266
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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