SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 142
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ऋद्धि, मंत्र और साधनविधि । १३३ mmmmmmmmmmmmm मंत्र-ॐ नमो हीं श्रीं क्लीं ऐं ह्यौं पद्मावत्यै देव्यै नमो नमः स्वाहा।। विधि-कुसूमके रंगसे रंगे हुए सूतको १०८ बार ऋद्धिमंत्र द्वारा मंत्रकर और उसे गुग्गुलकी धूप देकर बाँधने तथा यंत्रके पास रखनेसे गर्भका स्तंभन होता हैअसमयमें गर्भका पतन नहीं होता है । ऋद्धि-ॐ हीं अहं णमो जल्लोसहिपत्ताणं । मंत्र-ॐ नमो जयविजयापराजित महालक्ष्मी अमृतवर्षिणी अमृतस्राविणी अमृतं भव भव वषट् सुधाय स्वाहा।। विधि-उक्त ऋद्धिमंत्रकी आराधना करने और यंत्र पास रखनेसे दुर्भिक्ष, चोरी, मरी, मिरगी, राजभय आदि सब नष्ट होते हैं । इस मंत्रकी आराधना स्थानकमें करनी चाहिए और यंत्रका पूजन करना चाहिए। ऋद्धि-ॐ ही. अर्ह णमो विप्पोसहिपत्ताणं । मंत्र-ॐ हीं श्रीं कलिकुण्डदण्डस्वामिन् आगच्छ आगच्छ आत्ममंत्रान् आकर्षय आकर्षय आत्ममंत्रान् रक्ष रक्ष परमंत्रान् छिन्द छिन्द मम समीहितं कुरु कुरु स्वाहा । विधि-ऋद्धिमंत्रकी आराधनासे और यंत्र पास रखनेसे सम्पत्तिलाभ होता है । विधान-१२००० जाप लाल पुष्प द्वारा करनी चाहिए और यंत्रकी पूजन भी -साथमें करनी चाहिए। ३७- .. ऋद्धि-ॐ ही अर्ह णमो सव्वोसहिपत्ताणं । मंत्र-ॐ नमो भगवते अप्रतिचक्रे ऐं क्लीं ब्लू ॐ हीं मनोवांछितसिद्धयै नमो नमः अप्रतिचक्रे ही ठः ठः स्वाहा। विधि-ऋद्धिमंत्र द्वारा २१ बार पानी मंत्रकर मुँहपर छींटनेसे और यंत्र पास रखनेसे दुर्जन वश होता है-उसकी जीभका स्तंभन होता है। ऋद्धि-ॐ हीं अहँ णमो मणवलीणं । मंत्र-ॐ नमो भगवते महानागकुलोच्चाटिनी कालदष्टमृतकोत्थापिनी परमंत्रप्रणाशिनी देवि शासनदेवते ही नमो नमः स्वाहा ।
SR No.002454
Book TitleBhaktamar Katha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUdaylal Kasliwal
PublisherJain Sahitya Prasarak karyalay
Publication Year1930
Total Pages194
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy