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________________ भक्तामर-कथा। 'मंत्र-ॐ श्रां श्रीं श्रृं श्रः शत्रुभयनिवारणाय ठः ठः नमः स्वाहा। . विधि-यंत्र पास रखने और मंत्रको १०८ बार जपनेसे सन्तानकी प्राप्ति होती है, लक्ष्मी मिलती है, सौभाग्य बढ़ता है, विजयलाभ होता है और बुद्धि बढ़ती है। २१ ऋद्धि- हीं अहं णमो पण्णसमणाणं । मंत्र-ॐ नमः श्रीमणिभद्र जय विजय अपराजिते सर्वसौभाग्यं सर्वसौख्यं कुरु कुरु स्वाहा । विधि-मंत्रको ४२ दिनतक प्रतिदिन १०८ बार जपनेसे और यंत्र पास रखनेसे सब अपने अधीन होते हैं। ऋद्धि-ॐ हीं अहं णमो आगासगामिणं । मंत्र-ॐ नमो श्रीवीरेहिं जूंभय मुंभय मोहय मोहय स्तंभय स्तंभय अवधारणं कुरु कुरु स्वाहा। : विधि--डाकिनी, शाकिनी, भूत, पिशाच, चुड़ेल जिसे लगी हों उसे मंत्र द्वारा हल्दीकी गांठको २१ बार मंत्रकर चबानेसे और गलेमें यंत्र बांधनेसे उक्त सब प्रकारके दोष मिटते हैं। २३ ऋद्धि-ॐ ही अहं णमो आसीविसाणं । मंत्र-ॐ नमो भगवती जयावती मम समीहितार्थे मोक्षसौख्यं कुरु कुरु स्वाहा । विधि-पहले मंत्रको १०८ बार जपकर अपने शरीरकी रक्षा करे । पश्चात् जिसे प्रेतबाधा हो उसे झाड़े और यंत्र पास रखे। इससे प्रेतबाधा दूर होती है। २४-- ऋद्धि-ॐ हीं अहं णमो दिठिविसाणं। मंत्र-स्थावरजंगमवायकृतिमं सकलविषं यद्भक्तेः अप्रणमिताय ये दृष्टिविष'न्यान्मुनीन्ते वड्माणस्वामी सर्वहितं कुरु कुरु स्वाहा । ॐ हां ही हूं हः अ सि आ उ सा झौं स्वाहा। विधि--मंत्रद्वारा २१ बार राख मंत्रकर दुखते हुए सिरपर लगानेसे और यंत्र पास रखनेसे सिरकी सब पीड़ाएं दर होती हैं । मंत्र १०८ बार प्रतिदिन जपना चाहिए।
SR No.002454
Book TitleBhaktamar Katha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUdaylal Kasliwal
PublisherJain Sahitya Prasarak karyalay
Publication Year1930
Total Pages194
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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