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________________ जैन जाति महोदय प्रकरण पांचवा. ( ८६ ) सूरि की सुधि दिलाता था. किया था । जिन्होनें कि भारत का बड़ा उपकार कई दिन तक तो सारा संघ तीर्थ की यात्रा करता हुआ अक्षय लाभ उपार्जन करता रहा । बाद में यक्षदेवसूरि की अध्यक्षता में संघ पीछा रवाना हुआ किन्तु रत्नप्रभसूरि वहीं पुनीत तीर्थराज की गहन गुफाओ में रह गये ! वहीं आप ध्यान, समाधी और मौन अवस्थामें रहकर अपने जीवन को अनसनव्रतमें समाप्त कर स्वर्गलोक की और पधारे। आप श्री पार्श्वनाथ प्रभु के ग्यारखें पट्ट पर आचार्य हुए । • ( १२ ) बारहवें पट्ट पर आचार्य श्री यक्ष देवसूरि बड़े प्रतापशाली हुए। आप लोहाकोट नगर के सचिव प्रथसेन के होनहार सुपुत्र ( धर्मसेन ) थे । आपने तरुणवय में क्रोड़ रुपैयों की सम्पदा एवं सोलह स्त्रियों को त्याग कर आचार्य श्री रत्नप्रभसूरि के पास दीक्षा ली। आपका त्याग अनुकरणीय और तपस्या अलौकिक थी । आप लघुवय से ही पूरे बुद्धिवान थे । और दीक्षा लेने के पश्चात् आचार्य श्री रत्नप्रभसूरि की संरक्षता में आपने दस पूर्व का अध्ययन रुचिपूर्वक किया था। आप अपनी विचक्षण बुद्धि के कारण अपने पाठको शीघ्र सीख जाते थे । दूर दूर से लोग आपसे शंकाए निवृत करने के लिये आते थे । आप की व्याख्यानशैली तुली हुई और मनोहर थी । आप का उपदेश अबाल वृद्ध सब ही को रोचक प्रतीत होता था । यही कारण
SR No.002448
Book TitleJain Jati mahoday
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherChandraprabh Jain Shwetambar Mandir
Publication Year1995
Total Pages1026
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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