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________________ २७८ विसुद्धिमग्गो च एकच्चानं मनुस्सानं। तथा पियङ्करमाता यक्खिनी, उत्तरमाता, फुस्समित्ता, धम्मगुत्ता ति एवमादीनं एकच्चानं विनिपातिकानं आकासेन गमनं कम्मविपाकजा इद्धी ति। (७) चक्कवत्तिआदीनं वेहासगमनादिका पन पुजवतो इद्धि नाम। यथाह-"कतमा पुचवतो इद्धि? राजा चक्कवत्ती वेहासं गच्छति सद्धिं चतुरङ्गिनिया सेनाय अन्तमसो अस्सबन्ध-गोबन्धपुरिसे उपादाय। जोतिकस्स गहपतिस्स पुजवतो इद्धि। जटिलकस्स गहपतिस्स पुजवतो इद्धि। पञ्चन्नं महापुञानं पुजवतो इद्धी" (खु० नि० ५/३७६) ति। सङ्केपतो पन परिपाकं गते पुञ्जसम्भारे इज्झनकविसेसो पुञक्तो इद्धि। ___ एत्थ च जोतिकस्स गहपतिस्स पथविं भिन्दित्वा मणिपासादो उट्ठहि, चतुसट्ठि च कप्परुक्खा ति अयमस्स पुजवतो इद्धि। जटिलकस्स असीतिहत्थो सुवण्णपब्बतो निब्बत्ति। घोषितस्स सत्तसु ठानेसु मारणत्थाय उपक्कमे कते पि अरोगभावो पुजवतो इद्धि। मेण्डकस्स एकसीतमत्ते पदेसे सत्तरतनमयानं मेण्डकानं पातुभावो पुजवतो इद्धि। - पञ्च महापुञा नाम-मेण्डकसेट्टी, तस्स भरिया चन्दपदुमसिरि, पुत्तो धनञ्जयसेट्टी, सुणिसा सुमनदेवी, दासो पुण्णो नामा ति। तेसु सेट्ठिस्स सीसं न्हातस्स आकासं उल्लोकनकाले अड्डतेळसकोट्ठसहस्सानि आकासतो रत्तसालीनं पूरेन्ति। भरियाय नाळिकोदनमत्तं पि गहेत्वा सकलजम्बुदीपवासिके परिविसमानाय भत्तं न खीयति। पुत्तस्स सहस्सत्थविकं गहेत्वा सकलजम्बुदीपवासिकानं पि देन्तस्स कहापणा न खीयन्ति। सुणिसाय एकं वीहितुम्बं गहेत्वा एवं प्रथम कल्प के किन्हीं मनुष्यों का, प्रियङ्करमाता यक्षिणी, उत्तरमाता, पुष्यमित्रा, धर्मगुप्ता आदि किन्हीं विनिपातकों का आकाश में उड़ना कर्मविपाकज ऋद्धि है। (७) पुण्यवान् ऋद्धि-चक्रवर्ती आदि का हवा में उड़कर जाना आदि पुण्यवान् की ऋद्धि है। जैसा कि कहा है-"कौन-सी पुण्यवान् की ऋद्धि है? चक्रवर्ती राजा चतुरङ्गिणी सेना के साथ, यहाँ तक कि अश्वपालकों एवं ग्वालों आदि के भी साथ आकाश में उड़ते हुए जाते हैं। (वैसी ही) ज्योतिक गृहपति की, जटिलक गृहपति की, घोषित गृहपति की पुण्यवान् ऋद्धि, मेण्डक गृहपति की पुण्यवान् ऋद्धि पाँच महापुण्यवानों की पुण्यवान् ऋद्धि है। . इनमें, ज्योतिक गृहपति का मणिमय प्रासाद पृथ्वी को भेदकर निकला, एवं चौसठ कल्पवृक्ष (भी)। यह उसकी पुण्यवान्-ऋद्धि है। जटिलक के (प्रभाव से) अस्सी हाथ का स्वर्ण-पर्वत उत्पन्न हो गया। घोषित को सात स्थानों पर मारने का प्रयास किया गया, फिर भी उसका सकुशल रहना पुण्यवान् ऋद्धि है। मेण्डक के लिये एक सीत (एक माप) मात्र (सीमा वाले) प्रदेश में सात रत्नों से जटित मेढ़ों (मेष) का प्रकट हो जाना पुण्यवान् ऋद्धि है। ___ पाँच महापुण्यवानों के नाम है-मेण्डक श्रेष्ठी, उसकी भार्या चन्द्रपद्मश्री, (उसका पुत्र) धनञ्जय श्रेष्ठी, पुत्रवधू सुमन देवी एवं दास पूर्ण। इनमें, सिर पर से स्नान करते समय श्रेष्ठी ने जिस समय आकाश की ओर देखा, आकाश से (बरसकर) लाल शालि के धान से साढ़े बारह हजार कोठरियाँ भर गयीं। भार्या मात्र एक नालि (एक प्रकार के माप का पात्र) भर भात लेकर समस्त जम्बूद्वीप के निवासियों को परोसती रही, किन्तु भात समाप्त नहीं हुआ। पुत्र एक हजार की थैली लेकर समस्त जम्बूद्वीप के निवासियों को देता रहा, किन्तु थैली के कार्षापण समाप्त नहीं
SR No.002429
Book TitleVisuddhimaggo Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDwarikadas Shastri, Tapasya Upadhyay
PublisherBauddh Bharti
Publication Year2002
Total Pages386
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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