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________________ चार अतिशयों से युक्त देवाधिदेव अर्हन् की विशेषता योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ४ से ५ है तथा प्रभु की भक्ति करने, अंजलिपूजा, गुणस्तुति करने एवं धर्मदेशना रूपी अमृत के आस्वादन करने की लोगों में होड़-सी लग जाती है। तियों और मनुष्यों से तो क्या, देवों से भी जब वे पुजते देखे जाते हैं; तभी उनके देवाधिदेवत्व के वास्तविक दर्शन होते हैं। 'यथास्थितार्थवादी' (जो पदार्थ जिस रूप में है, उसका उसी रूप में यथार्थ कथन करने वाले) विशेषण से प्रभु का वचनातिशय परिलक्षित होता है। जिस पदार्थ का जो स्वरूप हो, उस सद्भुत पदार्थ का वैसे ही रूप में कथन करने वाला ही यथास्थितार्थवादी कहा जा सकता है। जैसा कि वीतरागस्तुति में कहा गया है-आपकी हम पक्षपातरहित परीक्षा करना चाहें तो भी हम प्रतीतिपूर्वक जानते है कि-रागी-द्वेषी देव की और आप वीतरागदेव की; दोनों की तुलना हम नहीं कर सकते; क्योंकि आपका यथावस्थित अर्थ कथन रूप गुण दूसरे देवों की योग्यता पर स्वतः प्रतिबंध लगाने वाला निबंधरस माना जाता है। (अयोग बत्रीशी २२) सुरेन्द्र जैसों द्वारा नमन को आपकी ओर से दूसरों की अवगणना समझी जाय या आपको दूसरों के समान माना जाय। वस्तुतः आपके इस यथास्थित-वस्तु कथन रूप गुण से अन्य लोग भी आपकी अवगणना कैसे कर सकते हैं? (अयोग - १२) देवाधिदेव अर्हन्-'दिवु क्रीड़ा विजीगीषु....' धातु से देव-शब्द बना है; जिसकी शब्दशास्त्र के अनुसार व्युत्पत्ति होती है-'दिव्यते इति देवः' अर्थात् जिसकी पूजा या स्तुति होती है, वह देव है। ऐसे देव पूर्वोक्त सामर्थ्य एवं लक्षण वाले परमेश्वर, देवाधिदेव अर्हन् ही हो सकते हैं; दूसरे नहीं ।।४।। अब इस प्रकार के चार अतिशय वाले देवों की उपासना-सेवा-भक्ति करना, उनके शासन (धर्मसंघ) का स्वीकार करना, उनको सामने रखकर ध्यान-धारण करना, उनकी शरण स्वीकार करना आदि बातों के लिए साग्रह अनुरोध कर रहे हैं।६१। ध्यातव्योऽयमुपास्योऽयमयं शरणमिष्यताम् । अस्यैव प्रतिपत्तव्यं, शासनं चेतनाऽस्ति चेत् ॥५॥ अर्थ :- अगर आप में सद्-असद् का विचार करने की चेतना-बुद्धि है; तो ऐसे देव का ध्यान करना, उपासना करना, शरण में जाना और इनके ही शासन (धर्मसंघ) का स्वीकार करना चाहिए ।।५।। व्याख्या :- इस प्रकार के अतिशय वाले देवाधिदेव का राजा श्रेणिक के समान पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और |रूपातीत रूप में ध्यान करना चाहिए। श्रेणिक राजा श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के वर्ण, प्रमाण, संस्थान, संहनन, चौतीस अतिशय वाले योग गुण आदि गुणों के माध्यम से उनका ध्यान करता था, जिसके प्रभाव से ही वह आगामी चौवीसी में उन्हीं के वर्ण, प्रमाण, संस्थान, संहनन और अतिशयों से युक्त पद्मनाभ नामक प्रथम तीर्थंकर बनेंगे। आगे हमने स्तुति करते हुए कहा भी है-'आपने पहले तन्मयचित्त होकर महावीर परमात्मा का ध्यान किया है, जिससे आप उनके समान स्वरूप वाले तीर्थकर अवश्य ही होंगे। सचमुच, योग का प्रभाव अद्भुत है! आगम में भी कहा है|'अरिहंत श्री महावीर भगवान् जिस प्रकार के शील-सदाचार से युक्त हैं; आप उसी प्रकार के शील-सदाचार से युक्त | श्रीपद्मनाभअरिहंत के रूप में होंगे। इसलिए इसी देव की सेवा और उपासना करनी चाहिए। हमारे द्वारा दुष्कृत की निंदा और सुकृत की अनुमोदना इसी देव के सहारे से संसार के भय और दुःखों से हमें बचा सकती है। इसीलिए इन्हीं की शरण लेने की अभिलाषा करो। पूर्वोक्त अतिशय रहित पुरुषों द्वारा वर्णित (उपदिष्ट) अन्य शासन (धर्मसंघ) का स्वीकार न करके. पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त देवाधिदेव वीतराग के शासन को स्वीकार करो। यदि तुम में चेतना (सदअसद् का विवेक करने की ज्ञानशक्ति) है तो पूर्वोक्त लक्षण युक्त देव का ध्यान आदि करो। वास्तव में, चेतनावान् को दिया हुआ उपदेश सफल होता है, चेतना (विवेक बुद्धि) से रहित व्यक्ति को दिया गया उपदेश निष्फल होता है। कहा भी है-अरण्य में रुदन, मुर्दे के शरीर पर मालिश, कुत्ते की टेढ़ी पूंछ को सीधी करने का प्रयत्न, बहरे को संगीत सुनाना, जमीन में कमल का बीज बोना एवं ऊषरभूमि पर हुई वर्षा; ये सब बातें निष्फल हो जाती है, वैसे ही अज्ञानी व्यक्ति को दिया गया उपदेश व्यर्थ जाता है ।।५।। अब अदेव का लक्षण कहते हैं 74
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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