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________________ महाव्रतों की भावनाओं का स्वरूप योगशास्त्र प्रथम प्रकाश श्लोक २५ से २६ है । द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव रूप लक्षणों से युक्त विशेष सामग्री होने पर भी जिसका मन तृष्णा-रूपी काले सर्प के उपद्रव से रहित हो, उसीको प्रशम- सुख प्राप्ति होती है और उसीके चित्त में पूर्ण स्थिरता होती है। इसी कारण से | धर्मोपकरण रखने वाले साधुओं को शरीर और उपकरणों पर ममता नहीं होने से, अपरिग्रही की कोटि में बताया है। |कहा भी है यद्वत्तुरङ्गः सत्स्वप्याभरणभूषणेष्वभिषक्तः । तद्वदुपग्रहवानपि न सङ्गमुपयाति निर्ग्रन्थः ॥ ( प्रशम. १४१) जैसे आभूषणों से विभूषित होने पर भी घोड़े को उन आभूषणों पर ममता नहीं होती, इसी प्रकार धर्मोपकरण के रूप में कुछ वस्तुएँ रखने पर भी निग्रंथ मुनि उन पर ममत्व नहीं रखता । जिस तरह मूर्छा - रहित होकर धर्मोपकरण रखने से मुनि को दोष नहीं लगता, उसी तरह महाव्रतधारिणी रत्नत्रयाराधिका, निग्रंथ-साध्वियां भी गुरु के | उपदेशानुसार ममत्वभाव से रहित होकर धर्मोपकरण रखती हैं तो उन्हें भी परिग्रहत्व का दोष नहीं लगता। इस कारण से 'निग्रंथ-साध्वियों के लिए धर्मोपकरण परिग्रह रूप है और परिग्रह रखने के कारण स्त्रियों को मोक्ष नहीं होता,' ऐसा | कथन कहने वालों का प्रलापमात्र है ।।२४।। अब प्रत्येक महाव्रत की पांच-पांच भावनाओं (जो मुक्ति प्राप्ति में सहायक है) की महिमा बताते हैं । २५। भावनाभिर्भावितानि पञ्चभिः पञ्चभिः क्रमात् । महाव्रतानि नो कस्य, साधयन्त्यव्ययं पदम् ||२५|| अर्थ :- क्रमशः पांच-पांच भावनाओं से वासित (अनुप्राणित) महाव्रतों से कौन अव्यय (मोक्ष) पद प्राप्त नहीं कर सकता?' अर्थात् इन महाव्रतों की भावना - सहित आराधना करने वाले अवश्यमेव मोक्ष पद प्राप्त करते हैं ।।२५।। अब प्रथम महाव्रत की पांच भावनाएँ बताते हैं : ।२६। मनोगुप्त्येषणादानेर्याभिः समितिभिः सदा । दृष्टान्न - पानग्रहणेनाहिसां भावयेत्सुधीः ।।२६।। अर्थ मनोगुप्ति, एषणासमिति आदानभांड- निक्षेपणसमिति, ईर्यासमिति तथा प्रेक्षित ( देखकर) अन्न-जल ग्रहण करना, इन पांचों भावनाओं से बुद्धिमान् साधु को अहिंसाव्रत को पुष्ट करना चाहिए ।। २६ ।। व्याख्या : १. पहली मनोगुसिभावना के लक्षण आगे कहेंगे । २. जिस आहार- पानी या वस्त्र - पात्र आदि के लेने में किसी भी जीव को दुःख न पहुँचे, ऐसा निर्दोष आहार आदि लेना एषणासमिति है । ३. पाद, पादपीठ, वस्त्र, पात्र | आदि उपकरण लेने-रखने में जीव की विराधना न हो, इस प्रकार की यतना ( उपयोग ) सहित प्रवृत्ति करना आदानसमिति है । ४. रास्ते में जाते-आते नीचे की ओर सम्यग् दृष्टि रखकर किसी जीव की विराधना किये बिना यतना | पूर्वक गमनागमन करना ईर्यासमिति है । ५. आहार- पानी देखकर लेना और उपलक्षण से आहार करने के समय भी | अहिंसा - भाव रखना, ,जिससे चींटी, कुंथु आदि जीवों की विराधना न हो, यह दृष्टान्नपानग्रहण-भावना कहलाती है। | यहाँ पर गुप्ति और समिति को महाव्रत की भावना रूप समझना । तीन गुप्ति आदि का आगे इसी ग्रंथ में विस्तार से वर्णन | किया जायेगा, इसलिए गुप्तियों और समितियों को उत्तरगुण के रूप में भी समझा जा सकता है। कहा भी है- 'पिंड - विशुद्धि, पांच समिति, भावना, दो प्रकार का तप, प्रतिमा और अभिग्रह ये उत्तर गुण के भेद हैं। (नि. भा. ६५३४) अब मनोगुप्ति की भावना देखिए । जितनी भी हिंसा है, वह सबसे पहले मन में पैदा होती है ।। | यानी हिंसा में मनोव्यापार की प्रधानता है। सुना जाता है कि राजर्षि प्रसन्नचंद्र ने अहिंसा महाव्रत की मनोगुप्ति रूपभावना नहीं की, इस कारण बाहर से हिंसा नहीं करने पर भी एक दफा तो उन्होंने सातवें नरक के योग्य पापकर्मदल | इकट्ठे कर लिये थे । एषणासमिति, आदानसमिति और ईर्यासमिति; ये अहिंसा महाव्रत के लिए अत्यंत उपकारी है। | इसलिए इन भावनाओं से अंतःकरण सुवासित करना चाहिए, दृष्टान्नपानग्रहण ( देखकर अन्न पानी ग्रहण करने की भावना से एवं त्रसादि जीवों सहित आहार- पानी का त्याग करने से यह भी अहिंसा - महाव्रत की उपकारिणी होती है। | इस प्रकार अहिंसा - महाव्रत की पांच भावनाओं का वर्णन पूर्ण हुआ ।। २६।। अब दूसरे महाव्रत की पांच भावनाएँ देखिए . 50
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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