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________________ भरत-बाहुबली युद्ध योगशास्त्र प्रथम प्रकाश श्लोक १० विचारपूर्वक कार्य करने वाले सज्जन दुर्जनों के वचनों से बहकते नहीं। भगवान् ऋषभदेव स्वामी ही हम दोनों के स्वामी है। वे स्वामी ही एकमात्र विजयी हैं, तो फिर मुझे दूसरे स्वामी की क्या आवश्यकता है? वे मुझे अपना भाई समझते हैं तो भाई को भाई से डर क्यों? आज्ञा करने वाले तो स्वामी हैं; वे आज्ञा दें चाहे न दें। रिश्ते-नातेदारी का संबंध हो, इसमें क्या विशेषता है? क्या हीरा हीरे को नहीं काटता? यदि भरत देव, दानव और मानव के द्वारा सेव्य हो और उनके प्रति उनकी विशेष प्रीति हो, इससे मुझे क्या लेना-देना? सीधे मार्ग पर चलने वाले रथ को कोई हानि नहीं होती, मगर उत्पथ पर चलने वाला अच्छा से अच्छा रथ किसी ढूंठ या पेड़ से टकराकर चकनाचूर हो जाता है। इंद्र पिताजी के भक्त हैं, वे पिताजी के लिहाज से कदाचित् भरत को अपने आधे आसन पर बैठने का अधिकार दे दें। इतने मात्र से उनमें अहंकार आ जाना ठीक नहीं है। तुमने कहा कि समुद्र के समान उसकी सेना के सामने दूसरे राजाओं की सेना आटे में नमक के जितनी है, परंतु मैं उससे भी बढ़कर दुःसह वड़वानल के समान हूँ। सूर्य के तेज में दूसरे तेज विलीन हो जाते हैं, वैसे ही मेरी सेना में भरत की पैदल, रथ, घोड़े, हाथी, सेनापति और भरत भी प्रलीन हो जायेगा। अतः हे दूत! तुम जाओ और अपने स्वामी से कहो कि यदि वह अपने राज्य और जीवन को लड़ाई से सही सलामत रखना नहीं चाहता है, तो खुशी से लड़ने आये। मुझे उसका राज्य लेने की ख्वाहिश नहीं है। पिताजी के दिये हुए राज्य से ही मुझे संतोष है।' ___ दूत ने वहाँ से वापिस आकर बाहुबलि का सारा वृत्तांत भरतनरेश को सुनाया। अतः भरत ने भी बाहुबलि के साथ युद्ध करने की अभिलाषा से सेना के साथ कूच किया। चातुर्मास में जैसे बादलों से आकाश ढक जाता है, वैसे ही पराक्रमी बाहुबलि भी अपनी सेना के कूच करने से उड़ती हुई धूलि से पृथ्वीतल को आच्छादित करता हुआ भरत से पहुंचा। युद्ध के मैदान में युद्ध के लिए उद्यत आमने-सामने खड़े दोनों पक्षों के वीरों, महासुभटों और सैनिकों के शस्त्रास्त्रों की टक्कर ऐसी लगती थी, मानो जलजंतुओं की सामुद्रिक तरंगों के साथ परस्पर टक्कर हो रही। हो। भाले वालों का भाले वालों और बाण वालों का बाण वालों के साथ संग्राम ऐसा प्रतीत होता था, मानो साक्षात् | यमराज ही उपस्थित हो गये हों। तत्पश्चात् महाबलशाली बाहुबली ने समग्र सेना को रूई की पूनी के समान दूर हटाकर भरत से कहा-'अरे भाई! यों ही हाथी, घोड़ों, रथ और पैदल सेना का संहार करवाकर व्यर्थ पाप क्यों उपार्जन कर रहे हो? अगर तुम अकेले ही लड़ने में समर्थ हो तो आ जाओ; हम तुम दोनों ही आपस में लड़कर फैसला कर लें। बेचारी सेना को व्यर्थ ही क्यों संहार के लिए झौंक रहे हो?' यह सुनकर दोनों ने अपने-अपने सैनिकों को युद्धक्षेत्र से हट जाने को कहा। इस कारण वे साक्षी के रूप में रणक्षेत्र के दोनों ओर दर्शक के तौर पर खड़े हो गये। देव भी इसमें साक्षी रूप थे। दोनों भाईयों ने स्वयं ही परस्पर द्वंदयुद्ध करने का निश्चय किया। सर्व प्रथम दृष्टियुद्ध प्रारंभ हुआ। आमने-सामने पलक झपकाए बिना खड़े दोनों नरदेवों को देखकर देवों को भी भ्रम हो गया कि ये दोनों अनिमेष दृष्टि वाले देव तो नहीं है। दोनों के दृष्टि-युद्ध में भरत की पराजय हुई। अतः वाग्युद्ध हुआ, जिसमें पक्ष और प्रतिपक्ष की | स्थापना करके वाद-विवाद किया जाता है। इसमें भी भरत की हार हुई। अतः महाभुजबली दोनों बलवानों ने बाहुयुद्ध प्रारंभ किया। बाहुबलि ने अपनी बांह लंबी की, भरत उसे झुकाने लगा। परंतु भरत ऐसा मालूम होता था कि महावृक्ष की शाखा पर बंदर लटक रहा हो। तत्पश्चात् बाहुबलि की बारी आयी तो महाबलशाली बाहुबलि ने भरत की भुजा को एक ही हाथ से लता की नाल की तरह नमा दी। उसके बाद मुष्टियुद्ध हुआ। बाहुबलि पर भरत ने प्रथम मुष्टिप्रहार किया, परंतु जैसे सागर की लहरें तटवर्ती पर्वत पर टकराती है, उसी प्रकार उसकी मुष्टि सिर्फ टकरा कर रह गयी। बाहुबलि का कुछ भी न कर सकी। उसके बाद बाहुबलि की बारी आयी तो उसने भरत पर वज्र. के समान प्रहार किया; जिससे भरत गश खाकर नीचे गिर पड़ा। सेना की आंखों में आंसू थे। मूर्छा दूर होते ही जैसे | हाथी दंतशल से पर्वत पर ताडन करता है. वैसे ही दंड से भरत ने बाहबलि को ताडन करना शरू किया। बाहबलि ने भी भरत पर दंड प्रहार किया। जिससे वह भमि में खोदे हए गडढे की तरह घटनों तक जमीन में धंस गया। भरत को जरा संशय हआ कि यह बाहबली कहीं चक्रवर्ती तो नहीं होगा। जब उसने चक्र को याद किया तब इतना याद 1. कहीं इंद्र ने बारह वर्ष बाद यह बात कही ऐसा उल्लेख आता है। 33
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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