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________________ बाहुबली के पास दूत योगशास्त्र प्रथम प्रकाश श्लोक १० यह बाहुबली किसी भी तरह से आज्ञा मानने को तैयार होगा ? क्या सिंह अपनी पीठ पर पलाण का लादना सहन करता है?' भरत ऐसे विचारसागर में गोते लगा रहा था, तभी उसके सेनापति ने कहा - 'स्वामिन्! आपके पराक्रम के सामने | तीन जगत् भी तिनके के समान है।' भरत ने अपने सौतेले छोटे भाई बाहुबली की राजधानी में दूत भेजकर संदेश कहलवाया । चतुर दूत ने ऊँचे सिंहासन पर बैठे बाहुबलि को प्रणाम किया और भरतेश का संदेश युक्तिपूर्वक कह | सुनाया- 'राजन्! आप वास्तव में एक प्रशंसनीय व्यक्ति हैं, जिनके बड़े भाई जगत् को जीतने वाले, भरत के छह खंड के स्वामी और लोकोत्तर पराक्रमशाली है। आपके बड़े भाई के चक्रवर्तित्व के राज्याभिषेक - उत्सव में मंगलमय भेंट | लेकर और आज्ञाधीन बनकर कौन राजा नहीं आता ? अर्थात् प्रत्येक राजा आये हैं। सूर्योदय से जैसे कमलवन सुशोभायमान होता है, वैसे ही भरत का उदय आपकी ही शोभा के लिए है। परंतु हमें आश्चर्य होता है कि आप उनके | राज्याभिषेक में क्यों नहीं पधारे ? 'कुमार! आपके नहीं आने का कारण जानने के उद्देश्य से ही नीतिज्ञ राजा ने मुझे आपकी सेवा में पहुंचने की आज्ञा दी है; और इसी हेतु से मैं आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ। हो सकता है कि आप | स्वाभाविक रूप से नहीं पधारे हों; परंतु इतने बड़े उत्सव में एक लघुबंधु के नाते आपके न पधारने से कितने ही लोग | इसे आपकी अविनितता समझते हैं। क्योंकि नीच पुरुष सदा छिद्र ढूंढा करते हैं। हम चाहते हैं कि ऐसे नीच लोगों को बोलने की कतई गुंजाइश न रहे। इस बात पर आपको भलीभांति ध्यान देना चाहिए और पहले से ही इसका बचाव | करके चलना चाहिए। अतः आपसे हमारा नम्र निवेदन है कि आपको अपने बड़े भैया की सेवा में पधारना चाहिए। बड़ा भाई महाराजा होता है, उसकी उपासना करने में कौन-सी लज्जा की बात है? आप कदाचित् यह सोचकर नहीं पधारे कि मैं तो उनके बराबरी का भाई हूँ; कैसे जाऊँ? तो इससे आपकी धृष्टता ही प्रकट होगी। आज्ञापालक राजा नाते| रिश्तेदारी का खयाल नहीं रखते। लोहचुंबक के निकट रखते ही जैसे लोहा खिंचा चला आता है, वैसे ही भरतनरेश के तेज और पराक्रम से देव, दानव और मनुष्य सभी खिंचे चले आते हैं। वर्तमान में तो सभी राजा एकमात्र भरत का ही अनुसरण करते है। इंद्र महाराज भी उन्हें आधा आसन देकर उनसे मित्रता बांधे हुए हैं। फिर समझ में नहीं आता कि आप उनकी सेवा में जाने से क्यों पीछे हट रहे हैं? शायद आप अपने आपको अधिक वीर समझकर राजा की अवज्ञा कर रहे हैं, तो यह आपकी बड़ी भ्रांति होगी। उनकी सेना के सामने आपकी मुट्ठी भर सेना ऐसी लगती है, जैसे समुद्र | के सामने एक छोटा-सा नाला। और उनके पास ऐरावण जैसे चौरासी लाख हाथी है, जिन्हें जंगम पर्वत के समान चलायमान करने में कौन समर्थ है ? उतनी ही संख्या में घोड़े और रथ हैं, जिनका वेग प्रलयकालीन समुद्र के तूफान के समान है। उनके वेग को रोकने में भला कौन समर्थ है? फिर उस चक्रवर्ती के अधीन ९८ करोड़ गांव हैं और सिंह | के समान ९६ कोटि पैदल सेना है; जिनसे वह चाहे जिसको व्यथित कर सकता है तथा उनके पास हाथ में दंडरत्नधारक | यमराज-सा सुषेण नामक एक सेनापति भी है; जिसके दंड को देव और असुर भी सहन नहीं कर सकते। साथ ही अमोघ | चक्ररत्न उस भरत चक्रवर्ती के आगे-आगे ऐसे चलता है; मानों सूर्य का मंडल चल रहा हो । सूर्य के सामने अंधकारसमूह टिक नहीं सकता, वैसे ही तीन लोक में कोई भी उसके तेज के सामने कैसे टिक सकता है? अतः हे बाहुबलि ! भरत महाराजा बल, वीर्य और तेज में समस्त राजाओं से बढ़कर है । इसलिए अगर आप अपने राज्य और जीवन की सुरक्षा चाहते हों तो आपको उनका आश्रय ग्रहण करना चाहिए ।' अपनी बाहुओं से जगत के बल को परास्त करने वाले बाहुबलि ने अपनी भ्रकुटि चढ़ाकर समुद्र की तरह गर्जती | हुई गंभीर वाणी में कहा - 'दूत ! तुमने ऐसे वचन कहे हैं, जो लोभ से लिप्त और क्षुब्ध करने वाले हैं। दूत तो सदा स्वामी के वचन को यथार्थ संदेश के रूप में पहुंचाने वाले होते हैं। ऐ दूत ! सुरों, असुरों और नरेन्द्रों के पूज्य, उत्तम - पराक्रमी | पिताजी ही मेरे लिये पूजनीय और प्रशंसनीय नहीं, अपितु भरत भी मेरे लिये पूजनीय व प्रशंसनीय है, यह बात तुमने नयी नहीं सुनायी । कर देने वाले राजा चाहे उनसे दूर रहें, परंतु जिसका बलवान भाई बाहुबलि है, वह क्षेत्र से दूर | रहते हुए भी अपने भाई के निकट ही है। सूर्य और कमलवन के समान हम दोनों की परस्पर गाढ़ प्रीति है। अपने भाई का मेरे हृदय में स्थान है। फिर वहां जाने से क्या प्रयोजन है? हमारी प्रीति तो जन्म से ही स्वाभाविक है। हम सहजभाव से भैया के पास नहीं पहुंचे, यह बात सत्य है। परंतु इसे भैया भरत के प्रति मेरी कुटिलता क्यों समझी जाय ? 32
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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