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________________ पदस्थ ध्यान का स्वरूप योगशास्त्र अष्टम प्रकाश श्लोक २३ से २८ हुए अनाहत-सहित मंत्राधिप अहं का चिंतन करे। उसके बाद मुखकमल में प्रवेश करते हुए, भूलता | में भ्रमण करते हुए, नेत्रपत्रों में स्फुरायमान होते हुए, भालमंडल में स्थित, तालु के रन्ध्र से बाहर निकलते हुए, अमृत-रस बरसाते हुए, उज्ज्वलता में चंद्रमा के प्रतिस्पर्धी, ज्योतिमंडल में विशेष प्रकार | से चमकते हुए, आकाश-प्रदेश में संचार करते हुए और मोक्षलक्ष्मी के साथ मिलाप कराते हुए समस्त अवयवों से परिपूर्ण 'अहं' मंत्राधिराज का बुद्धिमान योगी को कुंभक के द्वारा चिंतन करना चाहिए।।१८-२२।। कहा है किअकारादि-हकारान्तं, रेफमध्यं सबिन्दुकम् । तदेव परमं तत्त्वं, यो जानाति स तत्त्ववित् ॥१॥ अर्थ :- अकार जिसके आदि में है, हकार जिसके अंत में है और बिन्दुसहित रेफ जिसके मध्य में है, वही 'अहं' ____परम तत्त्व है। उसे जो जान लेता है, वही वास्तव में तत्त्वज्ञ है। अब मंत्रराज के ध्यान का फल कहते हैं।७९४। महातत्त्वमिदं योगी, यदैव ध्यायति स्थिरः । तदैवानन्दसम्पद्भूः, मुक्तिश्रीरुपतिष्ठते ॥२३।।। अर्थ :- जो योगी चित्त को स्थिर करके इस महातत्त्व-स्वरूप 'अह" का ध्यान करता है, उसके पास उसी समय | . आनंद रूपी संपभूमि के समान मोक्ष-लक्ष्मी हाजिर हो जाती है ।।२३।। उसके बाद की विधि बताते हैं१७९५। रेफ-बिन्दु-कलाहीनं शुभ्रं, ध्यायेत् ततोऽक्षरम् । ततोऽनरक्षरतां प्राप्तम्, अनुच्चार्य विचिन्तयेत् ।।२४।। अर्थ. :- उसके बाद रेफ, बिन्दु और कला से रहित उज्ज्वल 'ह' वर्ण का ध्यान करे। उसके बाद वह 'ह' अक्षर मानो अनक्षर बन गया हो, इस रूप में मुख से उच्चारण किये बिना ही चिंतन करे ।।२४।। उसके बाद१७९६। निशाकर-कलाकारं, सूक्ष्मं भास्करभास्वरम् । अनाहताभिधं देवं, विस्फुरन्तं विचिन्तयेत् ॥२५।। अर्थ :- दूज के चंद्रमा की कला के आकार सदृश सूक्ष्म एवं सूर्य के समान देदीप्यमान अनाहत नामक देव को अनुच्चार्य मानकर अनक्षर की आकृति को प्राप्त उस स्फुरायमान 'ह' वर्ण का चिंतन करना . चाहिए।।२५।। १७९७। तदेव च क्रमात् सूक्ष्मं, ध्यायेद् बालाग्रसन्निभम् । क्षणमव्यक्तमीक्षेत, जगज्ज्योतिर्मयं ततः ॥२६॥ अर्थ :- उसके बाद उसी अनाहत 'ह' का बाल के अग्रभाग के समान सूक्ष्म रूप में चिंतन करे, फिर थोड़ी देर तक जगत को अव्यक्त, निराकार और ज्योतिर्मय स्वरूप में देखे ॥२६।। वह इस प्रकार७९८। प्रच्याव्यमानसङ्लक्ष्याद्, अलक्ष्ये दधतः स्थिरम् । ज्योतिरक्षयमत्यक्षम्, अन्तरुन्मीलति क्रमात् ।।२७।। अर्थ :- फिर लक्ष्य से मन को धीरे-धीरे हटाकर अलक्ष्य में स्थिर करने पर अंदर एक ऐसी ज्योति उत्पन्न होती है, जो अक्षय और इंद्रियों से अगोचर होती है। वह क्रमशः अंतर को खोल देती है ॥२७॥ इस विषय का उपसंहार करते हैं१७९९। इति लक्ष्यं समालम्ब्य लक्ष्याभावः प्रकाशितः । निषण्णमनसस्तत्र, सिध्यत्यभिमतं मुनेः ॥२८॥ अर्थ :- इस प्रकार लक्ष्य का आलंबन लेकर निरालंब-स्वरूप लक्ष्याभाव को प्रकाशित किया है। अलक्ष्य में मन को स्थापित करने वाले मुनि का मनोवांछित फल सिद्ध हो जाता है।॥२८॥ भावार्थ :- इस तरह अनाहत-अव्यक्त मंत्रराज कहा है। पूर्वोक्त विधि के अनुसार लक्ष्य का आलंबन ग्रहण करके उसमें आगे बढ़ते हुए क्रमशः आलंबन का त्यागकर निरालंबन-स्थिति में निश्चल होना चाहिए। इससे आत्म |स्वरूप प्रकट होता है। इसलिए प्रथम सालंबन ध्यान और बाद में निरालंबन ध्यान करना चाहिए ।।२८॥ ___अब दूसरे उपाय से परमेष्ठि-वाचक मंत्रमयी देवता की ध्यान-विधि को दो श्लोकों द्वारा बताते हैं। 431
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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