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________________ ।। ॐ अर्हते नमः ।। ८. अष्टम प्रकाश अब पदस्थ ध्यान का लक्षण कहते हैं१७७२। यत्पदानि पवित्राणि समालम्ब्य विधीयते । तत्पदस्थं समाख्यातं, ध्यानं सिद्धान्तपारगैः ॥१॥ अर्थ :- प्रभावशाली मन्त्राक्षर आदि पवित्र पदों का अवलंबन लेकर जो ध्यान किया जाता है, उसे सिद्धांत के पारगामी पुरुषों ने पदस्थध्यान कहा है ॥१॥ तीन श्लोकों द्वारा इसकी विशेषता बताते हैं७७३। तत्र षोडशपत्राढ्ये नाभिकन्दगतेऽम्बुजे । स्वरमालां यथापत्रं, भ्रमन्तीं परिचिन्तयेत् ॥२॥ १७७४। चतुर्विंशतिपत्रं च, हृदि पद्मं सकर्णिकम् । वर्णान् यथाक्रम तत्र, चिन्तयेत् पञ्चविंशतिम् ।।३।। १७७५। वक्त्रेब्जेऽष्टदले वर्णाष्टकमन्यत् ततः स्मरेत् । संस्मरन् मातृकामेवं, स्यात् श्रुतज्ञानपारगः ॥४॥ अर्थ :- इस ध्यान में नाभिकंद पर स्थित सोलह पंखुड़ियों वाले प्रथम कमल में प्रत्येक पत्र पर क्रमशः सोलह स्वरों 'अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, लु, लु, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः' की भ्रमण करती हुई पंक्ति - का चिंतन करना चाहिए। फिर हृदय में स्थित कर्णिकासहित कमल की चौबीस पंखुड़ियों (दलों) पर 'क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म' इन पच्चीस व्यंजनों का चिंतन करना चाहिए। (इनमें से चौबीस व्यंजनों को चौबीस पंखुड़ियों में और 'मकार' को कर्णिका में रखकर चिंतन करना।) तथा तीसरे आठ पंखुड़ी वाले कमल की मुख में कल्पना करनी, उसमें शेष आठ व्यंजनों-य, र, ल, व, श, ष, स, ह का चिंतन करना। इस प्रकार मातृका (वर्णमाला) का चिंतन-ध्यान करने वाला योगी श्रुतज्ञान का पारगामी होता है ॥२-४।। अब मातृका-ध्यान का फल कहते हैं७७६। ध्यायतोऽनादिसंसिद्धान्, वर्णानेतान् यथाविधि । नष्टादिविषये ज्ञानं, ध्यातुरुत्पद्यते क्षणात् ॥५॥ अर्थ :- अनादिकाल से स्वतःसिद्ध इन वर्गों का विधिपूर्वक ध्यान करने वाले ध्याता को थोड़े ही समय में नष्ट हुए, विस्मृत हुए, गुम हुए व खोये हुए पदार्थों के विषय में भूत, वर्तमान और भविष्यकालीन ज्ञान क्षणभर में उत्पन्न हो जाता है ॥५॥ विशेषार्थ :- कहा है कि-जाप करने से क्षयरोग, भोजन में अरुचि, अग्नि-मन्दता, कुष्टरोग, पेट में रोग, खांसी, दम आदि पर साधक विजय प्रास कर सकता है और अद्भुत वाणी बोलने लगता है। तथा मुख्यजनों द्वारा पूजा, सत्कार, परलोक में उत्तमगति और श्रेष्ठपद प्राप्त करता है ।।५।। · प्रकारांतर से बारह श्लोकों द्वारा पदमयी-मंत्रमयी देवता का स्वरूप ध्येय रूप से कहते हैं१७७७। अथवा नाभिकन्दाधः, पद्ममष्टदलं स्मरेत् । स्वरालीकेसरं रम्यं, वर्गाष्टकयुतैर्दलैः ॥६॥ १७७८। दलसन्धिषु सर्वेषु, सिद्धहस्तुतिविराजितम् । दलाग्रेषु समग्रेषु, मायाप्रणवपावितम् ॥७॥ १७७९। तस्यान्तरन्तिमं वर्णम्, आद्यवर्णपुरस्कृतम् । रेफाक्रान्तं कलाविन्दुरम्यं प्रलिय निर्मलम् ॥८॥ ।७८०। अर्हमित्यक्षरं प्राण-प्रान्तसंस्पर्शिपावनम् । ह्रस्व-दीर्घ-प्लुतं सूक्ष्ममतिसूक्ष्मं ततः परम् ॥९॥ 1. टीका में निम्न श्लोक दिया है - जापाज्जयेत्क्षयमरोचकमग्निमान्द्यं, कुष्ठोदरास्मकसनवसनादिरोगान् । प्राप्नोति चाप्रतिमवाग्महतीं महदम्यं, पूजां परत्र गतिं पुरुषोत्तमाप्ताम् ||१|| 429
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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