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________________ वेध-विधि परकाय प्रवेश विधि - एवं उपसंहार योगशास्त्र पंचम प्रकाश श्लोक २६० से २७१ नाड़ी-संचार के ज्ञान का फल कहते हैं७२२। नाडी शुद्धाविति प्राज्ञः, सम्पन्नाभ्यासकौशलः । स्वेच्छया घटयेद् वायुं, पुटयोस्तत्क्षणादपि ॥२६०॥ __ अर्थ :- इस प्रकार नाडी-शुद्धि के अभ्यास में कुशलता-प्रास विचक्षण पुरुष अपनी इच्छानुसार वायु को एक नासापुट (नाडी) से दुसरे नासापुट (नाडी) में तत्काल अदल बदल कर सकता है ॥२६०। इस प्रकार बांयी-दाहिनीनाड़ी में रहे हुए वायु का कालमान कहते हैं७२३। द्वे एव घटिके सार्धे, एकस्यामवतिष्ठते । तामुत्सृज्यापरां नाड़ीमधितिष्ठति मारुतः ।।२६१॥ ७२४। षट्शताभ्यधिकान्याहुः सहस्राण्येकविंशतिम् । अहोरात्रे नरि स्वस्थे, प्राणवायोर्गमागमम् ॥२६२॥ अर्थ :- एक नाड़ी में वायु ढाई घड़ी-(एक घंटा) तक बहती है, उसके बाद उस नाड़ी को छोड़कर दूसरी नाड़ी में बहने लगती है। इस प्रकार परिवर्तन होता है। एक स्वस्थ पुरुष में एक रात-दिन में २१६०० प्राणवायु का गमागम (श्वासोच्छ्वास) होता है ।।२६१-२६२।। वायु-संचार को नहीं जानने वाले तत्त्व निर्णय के अधिकारी नहीं होते। इसे कहते हैं।७२५। मुग्धधीर्यः समीरस्य, सङ्क्रान्तिमपि वेत्ति न । तत्त्वनिर्णयवा स कथं कर्तुं प्रवर्तते?॥२६३॥ अर्थ :- मुग्ध या अल्प बुद्धि वाला जो पुरुष वायु के संचार को भी नहीं जानता, वह तत्त्वनिर्णय की बात करने में कैसे प्रवृत्त हो सकता है? तत्त्वनिर्णय के लिए वायु-संक्रमण को जानना अत्यंत आवश्यक है ॥२६३।। अब आठ श्लोकों से वेध-विधि कहते हैं|७२६। पूरितं पूरकेणाधोमुखं हृत्पद्ममुन्मिषेत् । ऊर्ध्वस्रोतो भवेत्, तच्च, कुम्भकेन प्रबोधितम् ॥२६४।। ।७२७। आक्षिप्त रेचकेनाऽथ, कर्षेद् वायुं हृदम्बुजात् । ऊर्ध्वस्रोतः पथग्रथिं, भित्त्वा ब्रह्मपुरं नयेत् ।।२६५।। |१७२८। ब्रह्मरन्ध्रात् निष्क्रमय्य, योगी कृतकुतूहलः । समाधितोऽर्कतूलेषु, वेधं कुर्याच्छनैः शनैः ॥२६६।। १७२९। मुहुस्तत्र कृताभ्यासो, मालतीमुकुलादिषु । स्थिर-लक्ष्यतया वेधं, सदा कुर्यादतन्द्रितः ॥२६७।। ।७३०। दृढ़ाभ्यासस्तत कुर्याद् वेधं वरूणवायुना । कर्पूरागुरुकुष्ठादिगन्धद्रव्येषु, सर्वतः ॥२६८।। ।७३१। एतेषु लब्धलक्ष्योऽथ, वायुसंयोजने पटुः । पक्षिकायेषु सूक्ष्मेषु, विदध्याद् वेधमुद्यतः ॥२६९।। १७३२। पतङ्ग-भृङ्ग-कायेषु, जाताभ्यासो मृगेष्वपि । अनन्यमानसो धीरः सञ्चरेद् विजितेन्द्रियः ॥२७०॥ |७३३। नराश्वकरिकायेषु, प्रविशन् निःसरनिति । कुर्वीत सङ्क्रमं पुस्तोपलरूपेष्वपि क्रमात् ॥२७१॥ अर्थ :- पूरकक्रिया के द्वारा जब वायु भीतर ग्रहण की जाती है, तब हृदयकमल अधोमुख होता है और संकुचित हो जाता है। उसी हृदयकमल में कुंभक करने से वह विकसित और ऊर्ध्वमुख हो जाता है, उसके बाद हृदय-कमल की वायु को रेचक क्रिया द्वारा खींचे। इस रेचकक्रिया द्वारा वायु को बाहर न निकाले; अपितु ऊर्ध्वस्त्रोत बनाकर मार्ग में ग्रंथि को भेदकर ब्रह्मरन्ध में ले जाये। यहां समाधि प्राप्त हो सकती है। कौतुक-(चमत्कार) करने या देखने की इच्छा हो तो योगियों को उस पवन को ब्रह्मरन्ध्र से बाहर निकालकर, समाधि के साथ आक की रूई में धीरे-धीरे वेध करना चाहिए अर्थात् पवन को उस रूई | पर छोड़ना चाहिए। आक की रूई पर बार-बार अभ्यास करने से अर्थात् पवन को बार-बार ब्रह्मरन्ध्र पर और बार-बार रूई पर लाने का अभ्यास जब परिपूर्ण हो जाये, तब योगी को स्थिरता के साथ मालती. चमेली आदि पष्यों को लक्ष्य बनाकर सावधानी से उस पर पवन को छोडना चाहिए। इस तरह हमेशा अभ्यास करते-करते जब अभ्यास दृढ़ हो जाये और वरुणवायु चल रहा हो तब कपूर, अगर और कुष्ठ आदि सुगंधित द्रव्यों में पवन को वेध करना-(छोड़ना) चाहिए। इस प्रकार सबमें वेध करने 422
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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