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________________ वायु के शुभाशुभ फल योगशास्त्र पंचम प्रकाश श्लोक ४८ से ५७ इसका क्रमशः वर्णन करते हैं।५१०।नासिकारन्ध्रमापूर्य, पीतवर्णः शनैर्वहन् । कवोष्णोऽष्टाङ्गुलः स्वच्छो, भवेद् वायुः पुरन्दरः ॥४८।। अर्थ :- पृथ्वीतत्त्व का पुरंदर नामक वायु पीले रंग का है, उसका स्पर्श कुछ उष्ण और कुछ शीत है। वह स्वच्छ ___ है। धीरे-धीरे बहता हुआ नासिका के छिद्र को पूर्ण करके वह आठ अंगुल बाहर तक बहता है ।।४।। ।५११। धवलः शीतलोऽधस्तात्, त्वरितत्वरितं वहन् । द्वादशांगुलमानश्च, वायुर्वरुण उच्यते ॥४९।। अर्थ :- जिसका सफेद वर्ण है, शीत स्पर्श है और नीचे की ओर बारह अंगुल तक जल्दी-जल्दी बहने वाला है, उसे जलतत्त्व का वरुण वायु कहते हैं ।।४९।। ।५१२। उष्णः शीतश्च, कृष्णश्च, वहन् तिर्यगनारतम् । षडगुलप्रमाणश्च वायुः पवनसञ्जितः ॥५०॥ अर्थ :- पवन नाम का वायुतत्त्व कुछ उष्ण और कुछ शीत होता है, उसका वर्ण काला है और वह हमेशा छह अंगुल प्रमाण तिरछा बहता रहता है ।।५०॥ १५१३। बालादित्यसमज्योतिरत्युष्णश्चतुरगुलः । आवर्त्तवान् वहन्नूवं, पवनो दहनः स्मृतः ।।५१।। . अर्थ :- अग्नितत्त्व का दहन नामक वायु उदीयमान बालसूर्य के समान लाल वर्ण वाला है, अति-उष्णस्पर्श | वाला है और बवंडर (घूमती हुई आंधी) की तरह चार अंगुल ऊँचा बहता है ॥५१॥ कौन-से वायु में कौन-सा कार्य करना चाहिए? इसे कहते हैं।५१४। इन्द्रं स्तम्भादिकार्येषु, वरुणं शस्तकर्मसु । वायुं मलिनलोलेषु, वश्यादौ वह्निमादिशेत् ॥५२॥ अर्थ :- जब पुरन्दरवायु बहता हो, तब स्तंभनादि कार्य करने चाहिए। वरुणवायु के बहते समय प्रशस्त कार्य करना, पवनवायु के बहते समय मलिन और चपल कार्य करना तथा दहनवायु. चलता हो, उस समय वशीकरण आदि कार्य करना चाहिए ।।५२।। कार्य के प्रारंभ में, कार्य के प्रश्न-समय में जो वायु चलता हो, उसका फल चार श्लोकों द्वारा कहते हैं|१५१५। छत्र-चामर-हस्त्यश्वारामा-राज्यादिसम्पदम् । मनीषितं फलं वायुः, समाचष्टे पुरंदरः ॥५३।। ||५१६। रामाराज्यादिसम्पूर्णेः, पुत्रस्वजनबन्धुभिः । सारेण वस्तुना चापि, योजयेद् वरुणः क्षणात् ॥५४॥ ||५१७। कृषिसेवादिकं सर्वमपि सिद्धं विनश्यति । मृत्युभी कलहो वैरं, त्रासश्च पवने भवेत् ॥५५।। ||५१८। भयं शोकं रुजं दुःखं, विघ्नव्यूहपरम्पराम् । संसूचयेद् विनाशं च, दहनो दहनात्मकः ॥५६॥ अर्थ :- पुरंदर नाम का वायु जिस समय बहता हो, उस समय छत्र, चामर, हाथी, घोड़ा, स्त्री एवं राज्य आदि संपत्ति के विषय में कोई प्रश्न करे अथवा स्वयं कार्य आरंभ करे तो मनोवांछित फल मिलता है। वरुणवायु (जलतत्त्व) बहता हो, तब प्रश्न करे अथवा कार्य आरंभ करे तो उसी समय उसे संपूर्ण राज्य, पुत्र, स्वजन-बंधु और सारभूत उत्तम वस्तु की प्राप्ति होती है। प्रश्न या कार्यारंभ के समय पवन नाम का वायु बहता हो तो खेती सेवा-नौकरी आदि सब कार्य फलदायी हों तो भी वे निष्फल हो जाते हैं; मेहनत व्यर्थ नष्ट हो जाती है और मृत्यु का भय, क्लेश, वैर तथा त्रास उत्पन्न होता है। दहन स्वभाव वाला अग्नि नाम का वायु चलता हो, उस समय प्रश्न या कार्यारंभ करे तो वह भय, शोक, रोग, दुःख और विघ्न-समूह की परंपरा और धन-धान्यादि के विनाश का संसूचक है ॥५३-५६॥ अब चारों वायु का अतिसूक्ष्म फल कहते हैं५१९। शशाङ्क-रवि-मार्गेण, वायवो मण्डलेष्वमी । विशन्तः शुभदाः सर्वे, निष्क्रामन्तोऽन्यथा स्मृताः॥५७॥ अर्थ :- पुरंदर आदि चारों प्रकार के वायु चंद्रमार्ग या सूर्यमार्ग अर्थात् बांयी और दाहिनी नाड़ी में होकर प्रवेश करते हों, तो शुभदायक होते हैं और बाहर निकलते हों, तो अशुभदायक होते हैं ।।५७।। प्रवेश और निर्गम में शुभ-अशुभ होने के कारण बताते हैं 401
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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