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________________ धर्मस्वाख्यातभावना में प्रयुक्त धर्म अन्यमतीय ग्रंथों में नहीं योगशास्त्र चतुर्थ प्रकाश श्लोक १०२ अर्थ : धर्म जीवों को नरक रूपी पाताल में गिरने से बचाता है। धर्म अनुपम सर्वज्ञ का वैभव भी प्राप्त कराता . है ॥१०२।। व्याख्या :- धर्म के शेष फल तो आनुषंगिक समझने चाहिए। इसके संबंध में आंतरश्लोकों का भावार्थ प्रस्तुत करते हैं-पूर्वोक्त दस प्रकार के यतिधर्म को मिथ्यादृष्टि ने नहीं देखा (माना); और यदि किसी ने कभी कहा है तो वे चरण से आचरित करके नहीं कहा। किसी भी तत्त्व का अर्थ प्रत्येक व्यक्ति की वाणी से होता है. किसी के मन में भी होता है, परंतु उसे आचरण में लाकर क्रियान्वित करता हो, उसे समझना कि वह जिनधर्म का आराधक है। वेदशास्त्र में परवश बुद्धि वाले और उनके सूत्रों को कंठस्थ करने वाले तत्त्व से धर्म को लेशमात्र भी नहीं जानते। गोमेध, अश्वमेध आदि विभिन्न प्राणिवधमूलक यज्ञ करने वाले एवं प्राणिघात करने-कराने वाले याज्ञिक में धर्म कैसे हो सकता है? अश्रद्धेय. असत्य एवं परस्पर विरोधी वस्तु का प्रलाप करने वाले पुराण और उसके रचयिता पौराणिक का यह कौन-सा धर्म है? गलत व्यवस्था से दूसरे के द्रव्य को हरण कर लेने वाले, मिट्टी और जल आदि को ही शौचधर्म कहने वाले स्मार्त आदि के जीवन में धर्म कैसे हो सकता है? नहीं देना चाहने वाले यजमान से भी सर्वस्व लेना चाहने वाले, धन के लिए प्राणहरण करने वाले ब्राह्मण की यह अकिंचनता कैसे कही जा सकती है? रातदिन मुंह साफ करके खाने वाले, किन्तु भक्ष्य-अभक्ष्य के विवेक से रहित बौद्धधर्मियों का तपधर्म ही कहां रहा? 'कोमल शय्या पर सोना, प्रातःकाल मधुररस का पान करना, दोपहर को भोजन करना, शाम को ठंडा पानी पीना और आधी रात को किशमिश और शक्कर खाना चाहिए। इस प्रकार इच्छानुसार खाने-पीने में ही शाक्य (बौद्ध) ने सुंदर धर्म बताया है। जरा-से अपराध पर क्षणभर में शाप देने वाले लौकिक ऋषियों में क्षमाधर्म का जरा भी अंश नहीं होता। 'हमारी ब्राह्मणजाति ही सर्वोत्तम है; इस प्रकार के जातिमद में मत्त, दुर्व्यवहार वाले एवं इसी प्रकार के चित्त वाले चार आश्रमों में रहने वाले ब्राह्मणों में मार्दवधर्म कहां से हो सकता है? हृदय में दंभ के परिणाम चल रहे हो और बाहर से बकवृत्ति धारण करने वाले पाखंडव्रतधारकों में सरलता का अंशमात्र भी कहां से हो सकता है? पत्नी, घर, पुत्रादि परिवार और सदैव परिग्रह में रचेपचे लोभ के एकमात्र कुलगृह-ब्राह्मण में मुक्ति (निर्लोभता) धर्म भी कैसे हो सकता है? इस प्रकार राग, द्वेष या मोह से रहित केवलज्ञानी अरिहंत भगवान् की इस धर्मस्वाख्यातभावना का चिंतन करना चाहिए। मिथ्यावचन राग, द्वेष या मोह-अज्ञान के कारण ही निकलते हैं। इन दोषों का वीतराग में अभाव होने से अरिहंत मिथ्यावादी कैसे हो सकते हैं? जो रागद्वेषादि से कलुषित चित्त वाले हैं, उनके मुख से सत्य वचन का निकलना संभव नहीं है। वे इस तरह यज्ञ कराना, हवन कराना इत्यादि तथा अनेक बावड़ी, कुंए, तालाब, सरोवर आदि इष्टापूर्त कार्य करके पशुओं का घात कराकर स्वर्गलोक के सुख बताने वाले, ब्राह्मणों को भोजन कराने से पितरों की तृसि कराने की इच्छा वाले, घी की योनि आदि करवाकर तद्प प्रायश्चित्त कराने वाले, पांच आपत्तियों के कारण स्त्रियों का पुनर्विवाह जायज बताने वाले, जिनके पुत्र न होता हो, ऐसी स्त्रियों के लिए क्षेत्रज अपत्य (दूसरे पुरुष के साथ नियोग से उत्पन्न) का कथन करने वाले, दूषित स्त्रियों की रज से शुद्धि बताने वाले, कल्याणबुद्धि से यज्ञ में मारे हुए बकरे आदि से आजीविका चलाने वाले, सौत्रामणि यज्ञ में सात पीढ़ी तक मदिरापान कराने वाले, विष्ठाभक्षण करने वाली गाय के स्पर्श से पवित्रता मानने वाले, जलादि से स्नान करने मात्र से पापशुद्धि बताने वाले, बड़, पीपल, आँवले आदि वृक्षों की पूजा करने-कराने वाले, अग्नि में घी आदि के होमने से देवदेवियों की प्रसन्नता मानने वाले धरती पर गाय दूहने से अमंगल की शांति मानने वाले; स्त्रियों को नीचा दिखाने की तरह, उनके लिए वैसे ही व्रत और धर्म का उपदेश देने वाले तथा जटाधारण करने, कान छिदाने, शरीर पर भस्म रमाने, लंगोट लगाने, आक, धतूरा, बिल्वपत्र, तुलसी आदि से देवपूजा करने वाले; नितंब बजाते हुए, नृत्य, गीत आदि बार-बार करते हुए, मुंह से बाजे की-सी आवाज निकालते हुए और असत्यभाषा बोलते हुए मुनि देवों और लोगों को छलते हुए, व्रतभंग कर दासत्व और दासीत्व की इच्छा करके बार-बार पाशुपतव्रत ग्रहण करने और त्यागने वाले हैं; औषधि आदि प्रयोग में जूं को मारते हैं, मनुष्य की हड्डी के 1. एक जैन मुनि ने भी आपत्ति में पुनर्विवाह के विचार पर विचार करने का लिख दिया है। 2. जैनों के अनुष्ठानों में भी होम-हवन आ गया है। 374
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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