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________________ सरलता की महिमा और लोभकषाय का स्वरूप योगशास्त्र चतुर्थ प्रकाश श्लोक १७ से १८ सद्गति का नाश कर बैठते हैं। अतः बुद्धिमान व्यक्ति को तिर्यचजाति में उत्पत्ति की बीज रूप, अपवर्गनगरी की अर्गला के समान, विश्वासवृक्ष के लिए दावाग्नितुल्य माया का तो त्यागकर देना चाहिए। पूर्वभव में श्री मल्लिनाथ अहंत के जीव ने अल्पमाया की थी, उस मायाशल्य को दूर न करने के कारण अर्थात् आलोचना और प्रायश्चित्त द्वारा आत्मशुद्धि न करने के कारण उन्हें माया के योग से जगत्पति तीर्थंकर के रूप में स्त्रीत्व मिला था ।।१६।। अब माया को जीतने के लिए उसकी प्रतिपक्षी सरलता की प्रेरणा करते हैं।।३४३। तदार्जवमहौषध्या, जगदानन्दहेतुना । जयेज्जगद्रोहकरी, मायां विषधरीमिव ॥१७॥ अर्थ :- इसलिए जगत् का अपकार-द्रोह करने वाली माया रूपी सर्पिणी को जगत् के जीवों को आनंद देने वाली ऋजुता सरलता रूपी महौषधि से जीतना चाहिए ।।१७।। व्याख्या :- जगत् के लोगों के लिए आरोग्यदायिनी प्रीतिविशेष ऋजुता (आर्जव) है, जो कपट भाव के त्याग पूर्वक माया-कषाय पर विजय प्राप्त कराकर मक्ति का कारण बनती है। ___ इस विषय में आंतरश्लोकों का भावार्थ प्रस्तुत करते हैं-अन्यधर्मीय शास्त्रों में भी सिद्धांत रूप में बताया है कि मुक्तिनगरी का अगर कोई सीधा रास्ता है तो वह सरलता का है; शेष जो मार्ग है, वह तो आचार का ही विस्तार है। थोड़े में यह समझ लो कि कपट सर्वथा मृत्यु का कारण है, जबकि सरलता अजर-अमर होने का कारण है। इतना ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है; बाकी का सब बकवास है। जगत् में सरलता का धनी मानव प्रीतिभाजन बनता है, जबकि कुटिलता से भरा मनुष्य सर्प की तरह उद्विग्नता प्राप्त करता है। सरलचित्त व्यक्ति संसारवास में रहता हुआ भी अनुभव करने योग्य सहज स्वाभाविक मुक्ति सुख का अनुभव करता है। कुटिलता की कील से जकड़ा हुआ क्लिष्टचित्त एवं ठगने में शिकारी के समान दक्ष मनुष्य स्वप्न में भी उस सुख को कैसे प्राप्त कर सकता है? भले ही मनुष्य समग्र कलाओं में चतुर हो, समस्त विद्याओं में पारंगत हो, लेकिन बालक की-सी सरलता तो किसी भाग्यशाली को ही नसीब होती है। अज्ञानी बालक की सरलता ही उसे प्रीतिभाजन बना देती है। यदि कोई मनुष्य सर्वशास्त्रों के अर्थ में परिनिष्ठ हो और साथ ही उसमें सरलता हो तो कहना ही क्या! सरलता स्वाभाविक है, कुटिलता बनावटी है। अतः स्वाभाविक | धर्म को छोड़कर कृत्रिम और अधर्म रूपी माया को कौन पकड़ेगा? छलप्रपंच, धोखाघड़ी, झूठ फरेब करने, चुगली खाने और मुंह पर कुछ ओर बोलने और हृदय में कुछ ओर भाव रखने आदि बातों में निपुण लोगों के संपर्क में आकर विरले ही भाग्यशाली स्वर्णप्रतिमा के समान निर्विकारी बने रह सकते हैं। गणधर श्री गौतम स्वामी श्रुतसमुद्र में पारंगत थे, फिर भी आश्चर्य है कि वे नवदीक्षित के समान सरलता के धनी बनकर भगवद्वचन सुनते थे। कितने ही दुष्कर्म किये हों; लेकिन सरलता से जो अपने कृत दुष्कर्मों की आलोचना कर लेता है, वह समस्त कर्मों का क्षय कर देता है। परंतु यदि लक्ष्मणा साध्वी की तरह कपट रखकर दंभ पूर्वक आलोचना की तो उसका पाप अल्पमात्र होते हुए भी वह संसारवृद्धि का कारण बनेगा। मोक्ष उसे ही मिलता है, जिसकी आत्मा में सब प्रकार की सरलता हो। जिसके मन, वाणी और कर्म (काया) में कुटिलता भरी है, उसकी मुक्ति किसी प्रकार भी नहीं होती। अतः सरलपरिणामी साधकों का चरित्र निर्दोष बताया है और कुटिल परिणामी साधक उग्र कर्मबंधन के भागी बनते हैं। विवेकबुद्धि से इन दोनों की तुलना करके शुद्ध बुद्धि वाले मुमुक्षु को अनुपम सरलभाव का आश्रय लेना चाहिए ।।१७।। __ अब लोभकषाय का स्वरूप बताते हैं।३४४। आकरः सर्वदोषाणां, गुणग्रसनराक्षसः । कन्दो व्यसनवल्लीनां, लोभः सर्वार्थबाधकः ॥१८॥ अर्थ :- जैसे लोहा आदि सब धातुओं का उत्पत्तिस्थान खान है, वैसे ही प्राणातिपात आदि समस्त दोषों की खान लोभ है। यह ज्ञानादि गुणों को निगल जाने वाला राक्षस है, आफत (दुःख) रूपी बेलों का कंद (मूल) है। वस्तुतः लोभ धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूपी समस्त अर्थों-पुरुषार्थों में बाधक है ॥१८॥ व्याख्या :- लोभ-कषाय सर्वदोषों की खान, समस्त गुणों का घातक, दुःख का हेतु और सर्वपुरुषार्थघातक है। अतः लोभ दुर्जेय है ।।१८।। आगे तीन श्लोकों में लोभ का स्वरूप बताते हैं। 338
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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