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________________ श्रावकधर्म पालक गृहस्थ की भावी सद्गति __ योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक १५४ से १५५ ।३२५। च्युत्वोत्पद्य मनुष्येषु, भुक्त्वा भोगान् सुदुर्लभान् । विरक्तो, मुक्तिमाप्नोति, शुद्धात्माऽन्तर्भवाष्टकम् ॥१५४॥ अर्थ :- इस प्रकार शास्त्रानुसार श्रावकधर्मपालक गृहस्थ सौधर्म आदि देवलोक में इंद्रपद या अन्य उत्तम स्थान प्राप्त कर लेता है। अपने उत्कृष्ट पुण्यपुंज के कारण वह सुखी रहता है। वहां से च्यवकर वह मनुष्य योनियों में उत्पन्न होकर विविध दुर्लभ सुखों का उपभोग करता है। फिर उनसे विरक्त होकर कर्मक्षय करके शुद्धात्मा होकर आठ भवों के अंदर-अंदर मुक्ति पा लेता है ॥१५३-१५४।। व्याख्या :- श्रावक धर्म का यथार्थ रूप से पालन करने वाला गृहस्थ सौधर्म आदि देवनिकाय में उत्पन्न होता है। सम्यग्दृष्टि अन्य तीन देवनिकायों में उत्पन्न नहीं होता। और देवलोक में भी वह इंद्रपद, सामानिक, त्रायस्त्रिंश पारिषद्य और लोकपाल आदि का स्थान प्राप्त करता है। 'उत्तम' कहने का मतलब यह है कि दास, किल्विषिक या अन्य हीन जाति का देव वह नहीं होता। जहां उत्पन्न होता है, वहां सर्वोत्कृष्ट और महापुण्य का उपभोग करता हुआ आनंद में रहता है। उत्तम रत्नों से बना हुआ विमान, बड़े-बड़े उद्यान, स्नान करने के लिए संदर वापिकाएँ, विचित्र रत्न, आभूषण, वस्त्र, अंगसेविका, देवांगनाएँ, कल्पवृक्षों की पुष्पमाला पर मंडराते हुए भौरों की तरह करोड़ों देवता सेवा के | लिए परस्पर प्रतिस्पर्धा करते हुए जय-जयकार के नारों से आकाश गूंजा देते है। वहां मन में इच्छामात्र से समग्र विषयसुख की प्राप्ति होती है। विविध प्रकार से सिद्धायतनों की यात्रा करने से अत्यंत हर्ष होता है। इन सब अनन्य असाधारण सुखों का अनुभव पूर्वपुण्य-प्रकर्ष से होता है। वैमानिक देवलोक से आयु पूर्ण करके मनुष्यभव में वह विशिष्ट देश, जाति, ऐश्वर्य, रूप आदि प्राप्त करके औदारिक शरीर में जन्म लेता है और वहां शब्द-रूप-रस-गंध-स्पर्श-विषयक अनुपम भोगों का उपभोग करता है। इसी बीच वैराग्य का निमित्त पाकर सांसारिकसुख से उत्कृष्ट विरक्तिभाव प्राप्त करके वह सर्वविरति स्वीकार करता है और उसी जन्म में क्षपकश्रेणि पर आरूढ़ होकर क्रमशः केवलज्ञान प्राप्त करके समस्त कर्मों को निर्मूल कर शुद्धात्मा बनकर मुक्ति प्राप्त करता है। यदि उसी जन्म में मुक्ति प्राप्त न कर सका तो वह जीव कितने भवों में मुक्ति प्राप्त करता है? इसे कहते हैं-वह जीव आठ भवों के अंदर-अंदर मुक्ति प्राप्त कर लेता है ।।१५३-१५४।। पूर्वोक्त तीन प्रकाशों में कहे हुए विषयों का उपसंहार करते हुए कहते हैं।३२६॥ इति सङ्क्षप्तः सम्यग्रत्नत्रयीमुदीरितम् । सर्वोऽपि यदनासाद्य, नासादयति निर्वृतिम् ॥१५५।। ____ अर्थ एवं व्याख्या :- इस प्रकार तीन प्रकाशों द्वारा ज्ञान-दर्शन-चारित्रात्मक रत्नत्रय रूप योग का स्वरूप कहा है। वह किस प्रकार कहा है? सम्यग् यानी जिनागमों के साथ विरोध न आये इस तरह संक्षेप में कहा है। छद्मस्थ के लिए विस्तार से कहना दुःशक्य है। इसीलिए संक्षेप में वर्णन किया गया है। रत्नत्रय के बिना अन्य किसी कारण से निर्वाणप्राति हो सकती है या नहीं? इस शंका का समाधान करते हुए कहते हैं इन सभी (तीनों) में से एक भी न्यून हो तो मुक्ति नहीं हो सकती। कहा है कि काकतालीय न्याय से भी त्रिरत्नप्राप्ति किये बिना कोई मुक्ति नहीं पा सकता। जो जीवादि तत्त्वों को नहीं जानता; जीवादि पदार्थों पर श्रद्धा नहीं करता, नये कर्म बांधता है और पुराने कर्मों का धर्मशुक्ल-ध्यान के बल से क्षय नहीं करता; वह संसार के बंधन से छूटकर मुक्ति नहीं पा सकता। इसीलिए सर्वोऽपि कहकर यह पुष्टि कर दी है कि ज्ञान, दर्शन और चारित्र की संयुक्त आराधना से ही आत्मा मुक्ति प्राप्त कर सकती है; अन्यथा नहीं ।।१५५।। ॥ इस प्रकार परमाईत श्री कुमारपाल राजा की जिज्ञासा से आचार्यश्री हेमचंद्रसूरीश्वर रचित अध्यात्मोपनिषद् नामक पट्टबद्ध, अपरनाम योगशास का स्वोपज्ञाविवरण सहित तृतीय प्रकाश संपूर्ण हुआ । 330
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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