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________________ योग शास्त्र की रचना का निर्णय योगशास्त्र प्रथम प्रकाश ४ सांगी वर्षाऋतु भी शोभायमान हुई। नये-नये कमलों के बहाने से हजारों नयन वाली बनकर अपनी उत्कृष्ट संपत्ति | को दिखाती हुई शरद् ऋतु भी सुशोभित होने लगी। मानो श्वेत अक्षर के समान ताजे मोगरे की कलियों से कामदेव की जयप्रशस्ति लिख रही हो; इस प्रकार हेमंतऋतु भी उपस्थित हुई। मोगरा और सिंदुरवार के पुष्पों से गणिका की तरह करने वाली हेमंत के समान सरभित शिशिरऋत ने भी अपनी शोभा बढ़ाई। इस तरह चारों तरफ सारी ऋतएँ प्रकट हो गयी। तब कामदेव की ध्वजा के समान देवांगनाएँ प्रकट हुई। उन्होंने भगवान् के पास अपने अंगोपांग खोलकर दिखाते हुए कामदेव को जीतने के मंत्रास्त्र के समान संगीत की तान छेड़ी। कई देवांगनाएँ लय के क्रम से गंधारराग से मनोहर वीणा बजाती हुई गीत गाने लगीं। और उलटे-सीधे क्रम से ताल व्यक्त करती हुई वे अपनी पूरी कला लगाकर मधुरतापूर्वक वीणा बजा रही थी। कितनी ही देवांगनाएँ प्रकट रूप में तकार-धोंकार के भेदों से मेघ-समान गंभीर आवाज वाले तीन प्रकार के मृदंग बजा रही थी। कितनी देवांगनाएँ तो आकाश और धरती पर चलती हुई आश्चर्य पैदा करने वाले नये-नये हावभाव से कटाक्ष करती हुई नृत्य करने लगीं। कितनी ही अंगनाएँ तो अंग मोड़ती व बलखाती हुई अभिनय करते समय टूटते हुए कंचुक और शिथिल हुए केशपाश को बांधने का अभिनय करती हुई अपनी बगलें दिखाती थीं। कई अपने लंबे पैर के अभिनय के बहाने मनोहर गोरोचन की लेप लगी हुई और गौर वर्ण वाली, अपनी जंघा से मूल भाग को बार-बार दिखाती थी। कितनी ही देवियाँ घाघरे की ढीली हुई गांठ को मजबूत बाँधने का नाटक करती हुई नाभिमंडल दिखाती थीं। कई हस्तिदंत-समान हाथ के अभिनय के बहाने से अंग के गाढ़ आलिंगन करने का इशारा करती थीं। कतिपय अँगनाएँ तो कमर के नीचे के अंदर के वस्त्र का नाड़ा मजबूती से बाँधने के बहाने ऊपर की साड़ी हटा कर अपने नितंब बताने लगीं, कई सुलोचना देवियाँ अंग को मोड़ने के बहाने छाती पर पुष्ट और उन्नत स्तनों को लंबे समय तक दिखाने लगी और कहने लगी कि 'यदि आप वीतराग हैं, तो हम लोगों में राग क्यों पैदा करते हैं? शरीर से निरपेक्ष हैं तो हम लोगों को अपनी छाती क्यों नहीं अर्पण कर देते? और यदि आप दयाल हैं, तो फिर अचानक खींचे हुए धनुष्य रूप अस्त्र वाले कामदेव से हमारी रक्षा क्यों नहीं करते? हमारी प्रेम की लालसा पर कौतुक से आपके द्वारा तिरस्कार करना कुछ समय तक तो ठीक है, परंतु मृत्यु पर्यन्त इस हठ को पकड़े रखना योग्य नहीं है। और कितनी ही देवियाँ यों कहने लगीं-'स्वामिन्! कठोरता का परित्यागकर अपना मन कोमल बनाओ। हमारा मनोरथ पूर्ण करो। हमारी प्रार्थना की उपेक्षा न करो।' इस तरह देवांगनओं के गीत, नृत्य, वाद्य-विलास, हावभाव तथा | प्रेम की मीठी-मीठी बातों से जगद्गुरु तिलभर भी नहीं डिगे। इस तरह अनेकों अनुकूल और प्रतिकूल उपसर्ग सहन करते-करते सारी रात बीत गयी। इसके बाद असुरधर्मी संगमदेव ने छह महीने तक प्रभु को शुद्ध आहार मिलने में विघ्न उपस्थित किये और तरह-तरह के उपद्रव करता गया। किन्तु अंत में हार-थककर वह भगवान् से बोला- 'भट्टारक! आप सुख से रहो और इच्छानुसार भ्रमण करो; अब मैं जाता हूँ।' इस प्रकार वह भारी पापकर्म बाँधकर छह महीने के अंत में गया। भगवान् का करुणाई हृदय पसीज उठा कि इस प्रकार के पापकर्म से यह बेचारा कहाँ जायेगा? इसकी क्या गति होगी? मेरे जैसा तारक भी इसे तार नहीं सका! इस प्रकार चिंतन करते-करते उनकी आंखें करुणा के आँसुओं से आर्द्र हो गयी। इस तरह इष्टदेव को नमस्कार कर मोक्षमार्ग के कारणभूत योग के संबंध में कहने की इच्छा से अब वह योगशास्त्र प्रस्तुत करते हैं ।४। श्रुताम्भोधेरधिगम्य, सम्प्रदायाच्च सद्गुरोः । स्वसंवेदनतश्चापि, योगशास्त्रं विरच्यते ॥४॥ अर्थ :- सिद्धांत रूपी समुद्र से, सद्गुरु-परंपरा से और स्वानुभव से जानकर मैं योग-शास्त्र की रचना करता हूँ।।४।। | योगशाख की रचना का निर्णय : प्रस्तुत श्लोक में बताया है कि योगपद का निर्णय (ज्ञान) करने के बाद शास्त्र रचना करना उचित है। इसलिए योग के निर्णय के लिए तीन हेतु जानना - १.शास्त्र से, २. गुरु-परंपरा से और ३. अपने अनुभव से। इन तीनों प्रकारों से योगशब्द का निर्णय कर इस 'योगशास्त्र' की रचना की जा रही है। इसी बात 12
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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