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________________ शकटाल मंत्री और वररुचि पंडित की परस्पर तनातनी योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक १३१ तो बतलाओ! इस पर वररुचि ने कहा-बस, बहन! काम यही है कि तुम्हारा पति राजा के सामने मेरे काव्यों की प्रशंसा कर दे। उसके इस अनुरोध पर मंत्री-पत्नी ने एक दिन अवसर देखकर मंत्री के सामने इस बात का जिक्र किया तो उसने कहा 'मैं उस मिथ्यादृष्टि की प्रशंसा कैसे कर सकता हूं।' फिर भी पत्नी के अत्यंत आग्रहवश मंत्री ने उस बात को मंजूर किया। सच है, 'बालक, स्त्री और मूर्ख की हठ प्रबल होती है। एक दिन वररुचि नंदराजा के सामने अपने बनाये हुए काव्य प्रस्तुत कर रहा था, तभी महामंत्री ने 'अहो सुंदर-सुभाषितम्' कहकर प्रशंसा की। इस पर राजा ने उसे एक सौ आठ स्वर्णमुद्राएँ ईनाम दी। वस्तुतः राजमान्य पुरुष के अनुकूल वचन भी जीवनदाता होते हैं। अब तो प्रतिदिन राजा से एक सौ आठ स्वर्णमुद्राएँ वररुचि को मिलने लगी। एकदिन शकटालमंत्री ने राजा से पूछा-आप वररुचि को क्यों दान देते हैं? राजा ने कहा-अमात्यवर! तुमने इसकी प्रशंसा की थी, इस कारण मैं देता हूं। यदि मुझे देना होता तो मैं पहले से ही न देता? किन्तु जिस दिन से तुमने उसकी प्रशंसा की, उसी दिन से मैंने उसे दान देना प्रारंभ किया है। इस पर मंत्री ने कहा-देव! मैंने उसकी प्रशंसा नहीं की थी; मैंने तो उस समय दूसरे काव्यों की प्रशंसा की थी। वह तो दूसरों के बनाये हुए काव्यों को अपने बनाये हुए बताकर आपके सामने प्रस्तुत करता है। राजा ने पूछा-क्या यह बात सच है? मंत्री ने कहा-बेशक! इन काव्यों को मेरी पुत्री भी बोल सकती है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मैं कल ही आपको बता दूंगा। शकटाल के ७ पुत्रियां थीं-यक्षा, यक्षदत्ता, भूता, भूतदत्ता, सेणा, वेणा और रेणा। वे सातों बुद्धिमती थी। उनमें से पहली (यक्षा) एक बार सुनकर, दूसरी दो बार, तीसरी तीन बार यों क्रमशः सातवीं पुत्री सात बार सुनकर याद कर लेती थी। दूसरे दिन मंत्री ने अपनी सातों पुत्रियों को राजा के सामने एक पर्दे के पीछे कोई न देखे, इस तरह बिठा दी। सदा की भांति पंडित वररुचि ने १०८ नये श्लोक बनाकर प्रस्तुत किये। उसके तुरंत बाद मंत्री की यक्षा आदि सातों पुत्रियों ने क्रमशः वे श्लोक ज्यों के त्यों पुनः बोलकर सुना दिये। इस तरह राजा लड़कियों के मुंह से सात बार वररुचि-निर्मित श्लोकों को सुनकर अतिरुष्ट हो गया। उसने अब वररुचि को दान देना बंद कर दिया। सच है, मंत्रियों के पास अपकार और उपकार दोनों के उपाय होते हैं। वररुचि को भी एक उपाय सूझा। वह गंगातट पर पहुंचा और गंगा के पानी में एक यंत्र स्थापित किया। यंत्र के साथ वह पहले से १०८ स्वर्णमुद्राएँ कपड़े की एक पुटली में बांध देता। फिर सुबह गंगा की स्तुति करता, उस समय पैर से यंत्र को दबाता, जिससे सारी मुहरें उछलकर उसके हाथ में आ जाती थी। इस तरह वह प्रतिदिन करता था। नगर में सर्वत्र इसकी शोहरत (ख्याति) हो गयी। नागरिकों में बड़ा कुतूहल पैदा हुआ। वे विस्मय विमुग्ध होकर उसे देखने आने लगे। धीरे-धीरे यह बात राजा के कानों में पहुंची। अतः राजा ने मंत्री को बुलाकर उसके सामने वररुचि की प्रशंसा की। इस पर मंत्री बोला-यदि यह बात सच है तो प्रातःकाल आप स्वयं वहां देखने पधारें। इसके बाद मंत्री ने अपने एक विश्वस्त व्यक्ति को समझाकर गुप्त रूप से उसका भेद लेने के लिए भेजा। वह वहां जाकर पक्षी के समान वृक्ष के एक खोखले में छिपकर बैठ गया और देखता रहा कि वररुचि क्या करता है? इधर वररुचि गंगाजल में स्थापित यंत्र में चुपचाप १०८ स्वर्णमुद्राओं की पोटली रखकर घर चला गया। उसके जाने के बाद उस गुप्त पुरुष ने चुपके से स्वर्णमुद्राओं की वह जीवन सर्वस्व पोटली उठायी और उसे लेकर वह सीधा शकटालमंत्री के पास पहुंचा और उन्हें | एकांत में बुलाकर चुपचाप वह पोटली सौंप दी तथा उसका सारा भेद मंत्री को बता दिया। रात बीतते ही सुबह मंत्री उस पोटली को अपने साथ लेकर राजा के साथ गंगा नदी पर पहुंचा। ज्यों ही वररुचि ने देखा कि आज राजा स्वयं यह कौतुक देखने पधारे हैं, त्यों ही अभिमानी बनकर मूढ़ वररुचि जोर-जोर से अधिकाधिक स्तुति करने लगा। स्तुति पूर्ण होते ही उसने पैर से उस यंत्र को दबाया, लेकिन स्वर्णमुद्राओं की पोटली उछलकर बाहर नहीं आई अतः वह भौंचक्का होकर पानी में हाथ डालकर द्रव्य को टटोलने लगा, मगर धन की पोटली नहीं मिली। अतः वररुचि का चेहरा उतर गया। वह अवाक् होकर बैठ गया। तभी महामंत्री ने उसे छेड़ते हुए कहा-क्या पहले रखा हुआ धन गंगा नहीं दे रही है, जिसे तूं बार-बार ढूंढ़ रहा है? यह ले, तेरा धन! पहचान कर ले ले इसे! यों कहते हुए मंत्री ने वररुचि के हाथ में वह स्वर्णमुद्राओं की पोटली थमा दी। यह देखकर वररुचि के हृदय में तहलका मच गया। स्वर्णमुद्राओं की उस पोटली ने वररुचि की सारी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिला दी। इसलिए वह मौत से भी बढ़कर असह्य दशा का अनुभव कर रहा था। शकटामंत्री ने राजा से कहा-देव! देखिए इसकी पापलीला को! लोगों को ठगने के लिए यह शाम को इस यंत्र 309
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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