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________________ संगमदेव कृत घोर उपसर्ग योगशास्त्र प्रथम प्रकाश ३ कुलपर्वत चलायमान हो सकता है? फिर उस दुष्ट ने धूल हटाकर भगवान् के अंग-अंग को पीड़ित करने वाली वज्रमुखी चीटियाँ उत्पन्न की। वे सुई की नोक के समान, तीखे मुखाग्र वाली चीटियाँ प्रभु के शरीर के एक ओर से स्वेच्छा से चढ़कर दूसरी ओर से उतरने लगीं। भाग्यहीन की इच्छा की तरह चींटियों का उपद्रव भी निष्फल हुआ। तब उसने डांस का रूप बनाया। सच है, 'दुरात्माओं के दुष्कृत्य समाप्त नहीं होते।' डांस बनकर जब उसने भगवान् के शरीर पर कई जगह डसा तो उससे गाय के दूध के समान रक्त बहने लगा। उससे भगवान् ऐसे प्रतीत होने लगे मानो पर्वत से झरना बह रहा हो। ऐसे उपसर्ग से भी जब प्रभु क्षुब्ध नहीं हुए तो दुर्मति संगमदेव ने अतिप्रचंड दंश देने में तत्पर एवं दुःख से हटाई जा सकने वाली लाल रंग की चींटियों का रूप बनाया और प्रभु के शरीर में अपना मुंह गहरा गडा दिया। उस समय वे चीटियाँ ऐसी मालम होती थी. मानो प्रभु के शरीर पर एक साथ रोंगटे खड़े हो गये हों। ऐसे उपसर्ग के समय भी प्रभु अपने योग में दृढ़ चित्त रहे। परंतु देव तो किसी भी तरह से उनका ध्यान-भंग करने पर तुला हुआ था। अतः उसने बड़े-बड़े जहरीले बिच्छू बनाये, वे प्रलयकाल की आग की चिनगारियों के समान या तपे हुए बाण के समान भयंकर टेढ़ी पंछ करके अपने कांटों से प्रभु के शरीर को काटने लगे। उससे भी जब नाथ क्षुब्ध नहीं हुए तो कूट-संकल्पी देव ने तीखे दांतों वाले नेवले बनाये, वे खि-खि शब्द करते हुए दांतों से भगवान् के शरीर से मांस के टकडे तोड तोडकर नीचे गिराने लगे। उससे भी जब उसकी इच्छा पूर्ण न हई तो क्रद्ध होकर उसने यमराज की बाहों के समान प्रचंड एवं अति उत्कट फनों वाले सर्प बनाये। जैसे महावक्ष पर बेल लिपट जाती है, वैसे ही मस्तक से लेकर पैर तक प्रभु महावीर के शरीर से वे लिपट गये और फनों से इस प्रकार प्रहार करने लगे कि उनके फन भी कटने लगे। उन्होंने इस प्रकार डसा कि उनके दांत भी टूट गये। वे निर्विष बनकर रस्सी की तरह गिर पड़े। उसके बाद निर्दय देव ने तत्काल वज्रसम कठोर तीखे नखों एवं दातों वाले चूहे बनाए। वे अपने दांतों और मुंह से प्रभु के अंगों को नोच-नोचकर खाने लगे। और घाव पर नमक छिड़कने की तरह किये हुए घाव पर पेशाब करने लगे। परंतु ऐसा करने पर भी जब वे भगवान् को विचलित करने में सर्वथा असफल रहे, तब भूताविष्ट और मूसल के समान तीखे दंतशूल वाले हाथी जैसा रूप बनाया। जिसके पैर धरती पर पड़ते ही धरती कांप उठती थी और मानो नक्षत्रमंडल और आकाश को नाप लेगा, इतनी ऊँची सूंड उठाकर प्रभु पर टूट पड़ा। उसने अपनी प्रचंड सूंड से प्रभु को पकड़कर आकाश में बहुत ऊँचा उछाला। नीचे गिरते ही इसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे, इस बदनीयत से फिर हाथी ने अपने दंतशूल को ऊँचा उठाकर आकाश से गिरते हुए प्रभु को दांत की नोक पर झेल लिया। दाँत की नोक पर पड़ने से भगवान् का वज्रमय कठोर शरीर छाती से टकराया, जिसके कारण चिनगारियाँ उत्पन्न हुई। फिर भी बेचारा हाथी भगवान् का बाल भी बांका न कर सका। फिर उस देव ने वैरिणी के समान हथिनी बनाई, जिसने अपनी सूंड और दांत की पूरी ताकात लगाकर भगवान् के शरीर को भेदन करने का प्रयत्न किया और उस पर विषैला जल छींटने लगी। मगर हथिनी का प्रयोग भी मिट्टी में मिल गया। फिर उस अधम देव ने भयंकर पिशाच का रूप बनाया, जिसकी दाढ़े मगरमच्छ के समान उत्कट थी। उसका मुख अनेक ज्वालाओं से युक्त अग्निकुंड के समान भयानक चौड़ा, खोखले के समान खुला था। उसकी भुजाएँ यमराज के महल के तोरण-स्तंभ के समान लंबी थी। उसकी जांघे ताड़वृक्ष के समान ऊँची व लंबी थी। वह चमड़े के वस्त्र पहने व कटार धारण किये हुए अत्यंत अट्टहास करता हुआ, फुत्कार करता हुआ, कभी किलकारियां करता हुआ प्रभु को डराने लगा। उसने भगवान् पर अनेकों आफतें ढहाई। मगर तेल समाप्त हो जाने पर बुझे दीपक की तरह वह पिशाच आगबबूला होकर प्रभु के सामने हतप्रभ हो गया। तब क्रोध से उस निर्दयदेव ने एकदम सिंह का रूप बनाया और दहाड़ता हुआ, पूंछ फटकारता हुआ, पृथ्वी को मानो फाड़ता हुआ, आकाश और पृथ्वी को अपने क्रूर निनाद से गूंजाता हुआ भगवान् पर टूट पड़ा। अपनी वज्रसम दाढ़ों व शूल के समान नखों से वह भगवान् पर लगातार आक्रमण करने लगा। दावानल से जले वृक्ष के समान उसे इसमें निष्फलता मिलने पर दुष्ट देव ने सिद्धार्थ राजा और त्रिशलादेवी का रूप बनाकर प्रभु से कहा-"पुत्र! तूं ऐसा अतिदुष्कर तप क्यों कर रहा है? तूं यह दीक्षा छोड़ दे, हमारी प्रार्थना को मत ठुकरा। वृद्धावस्था में नंदीवर्द्धन ने हमारा त्याग कर दिया है और हम निराधार हो गये हैं। तूं हमारी रक्षा कर।" यों कहते हुए वे दोनों दीन स्वर से विलाप करने लगे। उनके ऐसे विलापों से भी प्रभु का हृदय 10
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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