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________________ गुरु वंदन सूत्र के अवशिष्ट पाठ पर विवेचन योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक १२९ | बोलते वक्त ललाट का स्पर्श करना, उसके बाद संफासं बोलते हुए दो हाथ और मस्तक से रजोहरण का स्पर्श करे उसके बाद मस्तक पर दो हाथ की अंजलि कर गुरुसम्मुख दृष्टि रखकर खमणिज्जो भे किलामो से लेकर दिवसो वइक्कंतो तक | सूत्र बोलना । इन पदों का अर्थ इस प्रकार है - अहो कायं = गुरु की काया - चरणों को काय = हाथ और मस्तक रूपी मेरी | काया से संफासं= स्पर्श करता हूं। यहां अध्याहार से अर्थात् आपश्रीजी के चरणों में मैं नमस्कार करता हूं, उसकी आज्ञा दे, पहले मांगी हुई आज्ञा के साथ इसका संबंध है। अनुमति बिना गुरु का अंग - स्पर्श करने का अधिकार नहीं है। | बाद में खमणिज्जो भे आप क्षमा करने योग्य है, हे भगवन्! आपको किलामो अर्थात् मेरे स्पर्श से आपके शरीर में दुःख | रूप तथा अप्पकिलंताणं = अल्पमात्रा में पीड़ा हुई। बहुसुभेण = बहुत सुख रूप, भे= आपका दिवसो वइक्कंतो = दिन पूर्ण | हुआ है? यहां दिन शब्द से रात्रि, पक्ष, चौमासी और संवत्सरी भी प्रसंगानुसार समझ लेना चाहिए। इसी तरह दो हाथ | जोड़कर गुरु महाराज का प्रत्युत्तर सुनने की इच्छा से शिष्य को गुरु कहे कि तहत्ति = वैसे ही हुआ है; यानी मेरा दिन सुख रूप से पूर्ण हुआ है, इस प्रकार गुरु के शरीर के कुशल- समाचार पूछे । अब तप संबंधी कुशलता पूछते हैं- 'जत्ता भे' 'ज' इस अनुदात्तस्वर से उच्चारण करते समय दोनों हाथों से रजोहरण की दशियों का स्पर्श करे, बाद में हाथ को उठाते हुए रजोहरण और ललाट के मध्य में चौड़ा करते हुए 'त्ता' स्वरित स्वर से उच्चारण करे और अपनी दृष्टि गुरु| मुख के सामने रखे, फिर उन हाथों से ललाट का स्पर्श करते समय उदात्तस्वर से 'भे' अक्षर का उच्चारण करे। यहां | जत्ता = यात्रा और भे= आपश्री के अर्थ में है - अर्थात् भगवन्! आप की क्षायिक, क्षायोपशमिक और औपशमिक भाव | वाली संयमयात्रा तप और नियम रूप यात्रा - वृद्धियुक्त है ? गुरुदेव उत्तर दें कि तुब्भे वट्टइ = भावार्थ यह है- मेरी तप, संयम की यात्रा में तो वृद्धि हो रही है, तुम्हारी भी उस यात्रा में आगे वृद्धि होती होगी ? अब निग्रह करने योग्य पदार्थ के विषय में शिष्य फिर से कुशल मंगल पूछता है - जवणिज्जं च भे उसमें 'ज' अनुदात्त स्वर से उच्चारण करते हुए | पूर्ववत् हाथ ओघे से स्पर्श करे, बाद में दोनों हाथ उठाकर ललाट की ओर ले जाते हुए बीच में चौड़ा करके स्वरित स्वर से 'व' का उच्चारण करे और ललाट पर आते ही उदात्त स्वर से 'णि' का उच्चारण करे, यह तीन अक्षर बोलने | पर प्रश्न अधूरा होने पर भी उत्तर की राह देखे बिना ही फिर अनुदात्त स्वर से 'ज्जं' बोलते हुए दोनों हाथों से रजोहरण का स्पर्श करे, बाद में दोनों हाथों को ललाट की ओर ले जाते हुए मध्य में हाथ चौड़ेकर स्वरित स्वर से 'च' का उच्चारण करे, फिर हाथ से ललाट का स्पर्श करते हुए उदात्त स्वर से 'भे' शब्द का उच्चारण करे । उसके बाद गुरु | महाराज के प्रत्युत्तर की राह देखे और उसी अवस्था में बैठा रहे। जवणिज्जं च 'भे' का अर्थ है- नियंत्रण करने योग्य आपकी इंद्रियाँ और मन उपशमादि के सेवन से अबाधित है ? तात्पर्य यह है कि आप का शरीर, इंद्रियाँ तथा मन पीड़ा | से रहित है? इस तरह भक्ति पूर्वक पूछकर शिष्य ने गुरु का विनय किया। इसके बाद गुरुदेव ने उत्तर दिया कि एवं = हां, | इसी तरह इंद्रिय आदि से मैं अबाधित हूं। इसके बाद शिष्य ओघे पर दो हाथ और मस्तक लगाकर अपने अपराध की | क्षमायाचना के लिए इस प्रकार कहता है - खामेमि खमासमणो! देवसियं वइक्कमं अर्थात् हे श्रमागुणयुक्त श्रमण ! आज संपूर्ण दिन में अवश्य करने योग्य अनुष्ठान में विराधना रूप मुझ से अपराध हुए हों, उनके लिए आपसे क्षमा मांगता हूं, उसके बाद गुरु भी कहे कि अहमवि खामेमि = मैं भी तुम्हें खमाता हूं। अर्थात् पूरे दिन भर में तुम्हारे प्रति हितशिक्षा आदि में प्रमाद से अविधि से कोई अपराध हुए हों तो उनके लिए मैं क्षमा चाहता हूं। इसके बाद शिष्य नमस्कार पूर्वक क्षमायाचना करके अपने पैर के पीछे की भूमि का प्रमार्जन कर अवग्रह से बाहर | आकर आवस्सिआए से लेकर जो मे अइआरो कओ तक का सूत्र पाठ का उच्चारण करे। इस पाठ में अपने अतिचारों को निवेदन करने हेतु आलोचना (आत्म निवेदन) नामक प्रायश्चित्त का सूचक सूत्र है। उसके बाद तस्स खमासमणो | पडिक्कमामि इत्यादि पाठ में प्रतिक्रमण के योग्य प्रायश्चित्त विधि की सूचना है। और इसे साधक - 'फिर मैं ऐसा अपराध नहीं करूंगा और आत्मा को शुद्ध करूंगा' इस तरह की बुद्धि से अवग्रह से बाहर निकलते हुए बोले । आवस्सिआए| इसका अर्थ है - चरणसत्तरी - करणसत्तरी रूप अवश्य करने योग्य कार्यों के आसेवन सूचित करते हुए उसके निमित्त से अयोग्य सेवन हुआ हो, उसका पडिक्कमामि= प्रतिक्रमण करता हूं। अर्थात् उससे पीछे हटता हूं, यह सामान्य अर्थ कहकर अब विशेष रूप से कहते हैं-खमासमणाणं देवसिआए आसायणाए अर्थात् क्षमाश्रमण गुरु महाराज के प्रति 288
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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