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________________ त्थु की व्याख्या योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक १२३ सकता, वैसे ही श्रद्धा-रहित व्यक्ति आत्म-वस्तु तत्त्व के दर्शन करने में अयोग्य होता है। यानी तत्त्वदर्शन नहीं कर सकता। मार्गानुसारी श्रद्धा के बिना सुख प्राप्त नहीं कर सकता है। कल्याणचक्षु (श्रद्धा) होने पर ही यथार्थ वस्तुतत्त्व का ज्ञान व दर्शन होता है। इस कारण धर्म रूपी कल्पवृक्ष के लिए अमोघबीज रूप श्रद्धा भगवान् से प्राप्त होती है। अतः | भगवान चक्षु को देने वाले है। मग्गदयाणं=अर्थात् मोक्षमार्ग देने वाले को नमस्कार हो। यहां मार्गदाता का अर्थ हैसर्प की बांबी की तरह सीधी विशिष्ट गुणस्थान- श्रेणी को प्राप्त कराने वाले; स्वरसवाही यानी आत्मस्वरूप का अनुभव | कराने वाले, कर्मक्षयोपशम का स्वरूप बताने वाले । जिस पर चित्त का अवक्रगमन हो, जिसमें मोक्ष के अनुकूल चित्तप्रवृत्ति हो, उसे मार्ग कहते हैं । मोक्षमार्ग के बिना चित्त की प्रवृत्ति शुद्ध या अनुकूल नहीं होती । सुख भी मोक्षमार्ग पर | चलने से होता है। मोक्षमार्ग के अभाव में यथायोग्य गुणस्थान की प्राप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि मार्ग की विषमता से चित्त की स्खलना होती है और इससे गुण की प्राप्ति में वह चित्त विघ्न रूप होता है। ऐसा सरल सत्यमार्ग भगवान् से ही प्राप्त होता है, इसलिए भगवान् मार्गदाता है। 'सरणदयाणं' अर्थात् शरण को देने वाले भगवान् को नमस्कार हो, भय से पीड़ित का रक्षण करना शरण देना | कहलाता है। इस संसार रूपी भयंकर अटवी में अतिप्रबल रागद्वेषादि से पीड़ित जीवों की आत्माएँ दुःख-परंपरा से होने | वाले चित्तसंक्लेश से मूढ़ हो जाती है। उन आत्माओं को भगवान् तत्त्वचिंतन रूप अध्यवसाय का सुंदर आश्वासन देते हैं; इसलिए वे शरण - आधार रूप है। दूसरे आचार्य कहते हैं- विशेष प्रकार से तत्त्व जानने की इच्छा ही शरण है। इस | तत्त्वचिंतन का अध्यवसाय ही जीव को तत्त्व की प्राप्ति होने में कारण रूप है। १. तत्त्वश्रवण की इच्छा, २. तत्त्व का | श्रवण, ३. तत्त्व का ग्रहण, ४. तत्त्व का हृदय में धारण, ५. इससे विशिष्ट ज्ञान (विज्ञान) की प्राप्ति, ६. विज्ञान से विचार-तर्क करना ७. तत्त्व का निर्णय करना और ८. तत्त्व के प्रति दृढ़ आस्था रखना; ये बुद्धि के आठगुण तत्त्वचिंतन के अध्यवसाय से प्रकट होते हैं । यदि तत्त्वचिंतन का अध्यवसाय न हो तो ये गुण प्रकट नहीं होते, अपितु गुणों का आभास होता है; जिससे आत्मा का कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता । अतः अनेक दुःखों से किंकर्तव्यविमूढ़ बने हुए जीव | को आश्वासन देने वाली और बुद्धि के गुणों को प्रकाशित करने वाली तत्त्वचिंता रूपी शरण भगवान् से ही प्राप्त होती है। इसलिए भगवान् शरणदाता है। तथा बोहिदयाणं अर्थात् बोधिदाता भगवान् को नमस्कार हो । बोधि का अर्थ है| - श्री जिनेश्वर -प्रणीत धर्म की प्राप्ति होना । बोधि यथाप्रवृत्तिकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इन तीन व्यापारों के सामर्थ्ययोग से होती है। पहले कभी भेदन नहीं हुई रागद्वेष की ग्रंथी (गांठ) के भेदन करने से; प्रथम, संवेग, निर्वेद, अनुकंपा और आस्तिक्य रूप पांच लक्षणों के प्रकट होने से जीव को तत्त्वार्थ- श्रद्धा रूप सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है। अन्य आचार्यों ने 'बोधि' को 'विज्ञप्ति' कहा है। अभय, चक्षु, मार्ग, शरण और बोधि ये पांचों अपुनर्बन्धक को प्राप्त होते हैं। | जब पुनर्बन्धन के कारण पांचों अपने यथार्थ रूप में प्रकट नहीं होते, तब भगवान् इन पांचों अपुनर्बन्धक भावों का दान | देते है। ये पांचों भाव उत्तरोत्तर पूर्व-पूर्व के फल रूप है। वह इस प्रकार से है - अभयदान का फल चक्षु की प्राप्ति, | चक्षु का फल सम्यग्मार्ग की प्राप्ति, मार्ग का फल शरण की प्राप्ति और शरण का फल बोधि- (सम्यग्दृष्टि) की प्राप्ति है। यह बोधिबीज भगवान् से प्राप्त होता है। अतः भगवान् बोधिदाता है। इस प्रकार भगवान् अभयदाता, चक्षुदाता, | मार्गदाता, शरणदाता और बोधिदाता है। अतः पूर्वकथनानुसार उपयोगसंपदा की सिद्धि हुई । अब 'स्तोतव्यसंपदा' की ही विशिष्ट उपयोग रूप संपदा बताते हैं 'धम्मदयाणं, धम्मदेसयाणं, धम्मनायगाणं, धम्मसारहीणं, धम्मवरचाउरंतचक्कवट्टीणं'। 'धम्मदयाणं' का अर्थ | है - धर्म के दाता भगवान् को नमस्कार हो । यहां धर्म का अर्थ चारित्र - (विरति ) रूप धर्म लेना चाहिए। और वह धर्म साधुधर्म और श्रावकधर्म के भेद से दो प्रकार का है। साधुधर्म सर्वसावद्य (पापकारी) व्यापार के त्याग रूप है, पाप का आंशिक रूप से त्याग रूप देशविरतिश्रावकधर्म है। इन दोनों धर्मों को बताने वाले भगवान् ही है। उन्हीं से ही धर्म मिल सकता है। अन्य हेतु होने पर भी विरतिधर्म की प्राप्ति में प्रधानहेतु भगवान् ही हैं, इस कारण भगवान् को धर्मदाता कहा है। धर्मदाता धर्मदेशना के देने से होता है, अन्य कारण से नहीं, इसलिए कहते हैं- 'धम्मदेसयाणं' = यानी धर्म का उपदेश देने वाले भगवान् को नमस्कार हो। पहले कहे अनुसार दो प्रकार के विरतिधर्म के उपदेष्टा भगवान् का उपदेश 264
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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