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________________ साधु-साध्वीक्षेत्र में दान देने का माहात्म्य योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक ११९ एक पद भी मोक्षपद देने में समर्थ है। केवल एक सामायिक पद - मात्र से अनंत जीव सिद्ध हुए हैं। (तत्त्वार्थ संबंधकारिका | २७) यद्यपि रोगी को पथ्य आहार रुचिकर नहीं होता, वैसे ही मिथ्यादृष्टि को जिनवचन रुचिकर नहीं होता। फिर भी | स्वर्ग या अपवर्ग का मार्ग बताने में जिनवचन के सिवाय और कोई समर्थ नहीं है। इसलिए सम्यग्दृष्टि जीव को आगम पर आदर पूर्वक श्रद्धा करनी उचित है। क्योंकि जिसका निकट भविष्य में कल्याण होने वाला हो, वही भव्यजीव जिनवचन को भाव पूर्वक स्वीकार करता है। दूसरे को तो यह वचन कान में शूल भौंकने के समान दुःखदायी लगता है। इसलिए विपरीत और अश्रद्धामयी दृष्टि वाले के लिए वह अमृत भी विष रूप बन जाता है। यदि इस जगत् में | जिनवचन नहीं होते तो धर्म-अधर्म की व्यवस्था के बिना लोग भव रूप अंध- कूप में गिर जाते और गिरने के बाद उनका वहां से उद्धार कैसे होता ? 'जो मलाशय को साफ करना चाहता है, उसे हरें खाना चाहिए' वैद्य के इस वचन पर विश्वास रखकर जो हर्रे खा लेता है, उसे उसके प्रभाव से जुलाब लगता है। रोगी को वैद्य के वचन पर विश्वास बैठ जाता है, इतना ही नहीं, | बल्कि आयुर्वेदशास्त्र को वह प्रमाण मानने लगता है। इसी तरह अष्टांगनिमित्तशास्त्र में कहे हुए चंद्र, सूर्य या ग्रह की चाल या धातुवाद, रस- रसायण आदि के प्रत्यक्ष प्रभाव पर विश्वास हो जाने से व्यक्ति उन-उन शास्त्रों में कथित परोक्षभावों से संबंधित वचनों को भी जैसे प्रमाणिक मान लेता है; वैसे ही जिनवचन को समझने में जिसकी बुद्धि मंद है; उसको भी उसमें कहे हुए प्रत्यक्षभावों की तरह परोक्षभावों को या जो दृष्टि या बुद्धि से भी समझ में नहीं आते, वैसे भावों को भी सत्य रूप में निश्चय मानना चाहिए। इस दुःषमकाल में दिन-प्रतिदिन जनता की बुद्धि मंद होती जा रही है; जिससे जिनवचन का लगभग उच्छेद हो जायगा, ऐसा समझकर श्रीनागार्जुन, श्रीस्कंदिलआचार्य (श्री देवर्द्धिगणि क्षमाश्रमण ) आदि पूर्व महापुरुषों ने आगमों को लिपिबद्ध करके पुस्तकारूढ़ किये हैं। अतः जिनवचन के प्रति बहुमान रखने वाला श्रद्धालु श्रावक इन आगमादि शास्त्रों को पुस्तक रूप में लिखाये (प्रकाशित करवाये), वस्त्रादि | से लपेटकर आदर पूर्वक जिनागमों की पूजाभक्ति करे - करवाये । इसीलिए कहा है- जो भावुक व्यक्ति श्रीजिनेश्वरदेव के | वचन स्वरूप आगमादि शास्त्रों को लिखवाता है, (प्रकाशित करवाता है), वह पुरुष दुर्गति प्राप्त नहीं करता और भविष्य में गूंगा या जड़ - मूढ़ अथवा बुद्धिहीन नहीं होता और अंधा या मूर्ख आदि नहीं होता है। जो भाग्यशाली पुरुष जिनागम | लिखवाता (प्रकाशित करवाता है, निःसंदेह वह सर्वशास्त्रों का पारगामी होकर मुक्ति प्राप्त कर सकता है। जिनागम का | अध्ययन करने-कराने वाले का वस्त्रादि से पूजा - भक्ति पूर्वक सम्मान करना चाहिए। और भी कहा है- जो स्वयं जिनआगम पढ़ता है, दूसरों को पढ़ाता है और पढ़ने-पढ़ाने वालों को सदा वस्त्र, आहार, पुस्तक या पढ़ने की सामग्री देने | का अनुग्रह करता है, वह मनुष्य यहीं पर समस्त पदार्थों या तत्त्वों का जानकार हो जाता है। लिखे हुए शास्त्रों एवं ग्रंथों को संविग्न एवं गीतार्थ मुनिवर्यों को अतिसम्मान पूर्वक स्वाध्याय या व्याख्यान करने के लिए दान देना चाहिए। किसी भी आगम या ग्रंथ पर व्याख्यान कराना हो तो प्रतिदिन उसकी पूजाभक्ति पूर्वक श्रद्धाभाव से उसका श्रवण करना | चाहिए । निष्कर्ष यह है कि जिन-आगम के लिए अपना धनदान करके उसका सदुपयोग करना चाहिए। ४. साधु क्षेत्र चौथा सम्यक् क्षेत्र साधुगण हैं। श्री जिनेश्वर भगवान की आज्ञानुसार सम्यक् चारित्र के पालक, दुर्लभ मनुष्य जन्म को सफल करने के लिए संसारसमुद्र से पार उतरने और दूसरे को भी पार उतारने के लिए प्रत्यनशील; श्रीतीर्थंकर, गणधरों से लेकर आज तक के दीक्षित सामायिक-संयमी साधु-भगवंतों की यथायोग्य सेवा - | भक्ति में अपना धन लगाना चाहिए। वह इस प्रकार - उपकारी साधु-महाराज को कल्पनीय निर्दोष अचित्त आहारादि, | रोगनाशक औषधादि; शर्दी, गर्मी, वर्षा, रोग एवं लज्जा के निवारणार्थ वस्त्रादि और प्रतिलेखन एवं प्रमार्जन करने के | लिए रजोहरण आदि देना; आहार करने के लिए पात्रादि अन्य औपग्रहिक उपकरण- दंड आदि; तथा रहने के लिए मकान | आदि दान रूप में देना चाहिए। ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा से साधु के जीवनयापन | के लिए उपकारक न हो। इसलिए उनको संयमोपकारी सभी वस्तुओं का दान देना चाहिए। साधु-धर्म में दीक्षित होने | के लिए उद्यत, संसार विरक्त अपने पुत्र-पुत्रियों को भी साधुसाध्वियों को समर्पित करना चाहिए। अधिक क्या कहें? | जिस-जिस उपाय से मुनिगण निराबाध (पीडा रहित) वृत्ति से अपनी स्वपरकल्याणकारी मोक्षसाधना कर सकें; तदनुरूप 249 —
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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